Showing posts with label new media. Show all posts
Showing posts with label new media. Show all posts

Friday, September 17, 2010

संजय द्विवेदी की मीडिया केंद्रित पुस्तक का लोकार्पण 22 को


भोपाल। पत्रकार एवं मीडिया विश्वेषक संजय द्विवेदी की पुस्तक “मीडियाः नया दौर, नई चुनौतियां” का लोकार्पण समारोह 22 सितंबर, 2010 को अपराह्न 3.30 बजे भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सभागृह में आयोजित किया गया है।
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद प्रभात झा होंगें तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला करेंगें। आयोजन में इंडिया टीवी के कार्यकारी संपादक रविकांत मित्तल, विशिष्ट अतिथि होंगें। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी की यह किताब यश पब्लिकेशन दिल्ली ने प्रकाशित की है, जिसमें आज के मीडिया पर खास विमर्श है।
पुस्तक परिचयः
पुस्तक का नामः मीडियाः नया दौर नई चुनौतियां
लेखकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र

Saturday, March 13, 2010

ताकि बेमौत न मारे जाएं मीडियाकर्मी


इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाना जरूरी
- संजय द्विवेदी
मीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं।
अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है। जिसमें मीडिया की प्रामणिकता, विश्वसनीयता की चिंताएं तो हैं ही साथ ही उन पत्रकारों का जीवन भी एक अहम मुद्दा है जो अपना कैरियर इन नए-नवेले चैनलों के लिए दांव पर लगा देते हैं। चैनलों की बाढ़ ने न सिर्फ उनकी साख गिरायी है वरन मीडिया के क्षेत्र को एक अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की यह चिंता बहुत स्वाभाविक है कि कैसे इस क्षेत्र में मचे धमाल को रोका जाए। दिसंबर,2008 तक देश में कुल 417 चैनल थे जिसमें 197 न्यूज चैनल काम कर रहे थे। सितंबर,2009 तक सरकार 498 चैनलों के लिए अनुमति दे चुकी है और 150 चैनलों के नए आवेदन विचाराधीन हैं। टीवी मीडिया के क्षेत्र में जाहिर तौर पर यह एक बड़ी छलांग है। कितु क्या इस देश को इतने सेटलाइट चैनलों की जरूरत है। क्या ये सिर्फ धाक बनाने और निहित स्वार्थों के चलते खड़ी हो रही भीड़ नहीं है। जिसका पत्रकार नाम के प्राणी के जीवन और पत्रकारिता के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस दौर में दिल्ली जैसी जगह में हजारों पत्रकार अकारण बेरोजगार बना दिए गए हों और तमाम चैनलों में लोग अपनी तनख्वाह का इंतजार कर रहे हों इस अराजकता पर रोक लगनी ही चाहिए।
यह बहुत बेहतर है कि सरकार इस दिशा में कुछ नियमन करने के लिए सोच रही है। चैनल अनुमति नीति में बदलाव बहुत जरूरी हैं। यह सामयिक है कि सरकार अपने अनुमति देने के नियमों की समीक्षा करे और कड़े नियम बनाए जिसमें कर्मचारी का हित प्रधान हो। ताकि लूट-खसोट के इरादे से आ रहे चैनलों को हतोत्साहित किया जा सके। सरकार ने ट्राइ को लिखा है कि वह उसे इसके लिए सुझाव दे कि और कितने चैनलों की गुंजाइश इस देश में है और चैनलों की बढ़ती संख्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। अपने पत्र में मंत्रालय की चिंता वास्तव में देश की भी चिंता है। पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि नए चैनल शुरू करने वालों में बिल्डर,ठेकेदार, शिक्षा क्षेत्र में व्यापार करने वाले, स्टील व्यापारी समेत तमाम ऐसे लोग हैं जिनका मीडिया उद्योग से कोई लेना देना या पूर्व अनुभव नहीं है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह भी शिकायत मिली है चैनल शुरू करवाने को लेकर दलाली का एक पूरा कारोबार जोर पकड़ चुका है। उल्लेखनीय है कि चैनल शुरू करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय की अनुमति भी लेनी होती है।
हालांकि कुछ आलोचक यह कह कर इन कदमों की आलोचना कर सकते हैं कि यह कदम लोकतंत्र विरोधी होगा कि नए चैनल आने में अड़चनें लगाई जाएं। किंतु जिस तरह के हालात हैं और पत्रकारों व कर्मियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा रहा है उसमें नियमन जरूरी है। चैनल का लाइसेंस पाकर कभी भी चैनल पर ताला डालने का प्रवृत्ति से आम पत्रकारों को गहरा झटका लगता है। उनके परिवार सड़क पर आ जाते हैं। नौकरियों को लेकर कोई सुरक्षा न होना और पत्रकारों से अपने संपर्कों के आधार पर पैसै या व्यावसायिक मदद लेने की प्रवृत्ति भी उफान पर है। चैनल खोलने के शौकीनों से सरकार को यह जानने का हक है कि आखिर वे ऐसा क्या प्रमाण दे रहे हैं कि जिसके आधार पर यह माना जा सके कि आपके पास तीन या पांच साल तक चैनल चलाने की पूंजी मौजूद है। वित्तीय क्षमता के अभाव या मीडिया के दुरूपयोग से पैसे कमाने की रूचि से आने वालों को निश्चित ही रोका जाना चाहिए। चैनल में नियुक्त कर्मियों के रोजगार गारंटी के लिए कड़े नियमों के आघार पर ही नए नियोक्ताओं को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलनी चाहिए। मीडिया जिस तरह के उद्योग में बदल रहा है उसे नियमों से बांधे बिना कर्मियों के हितों की रक्षा असंभव है। पैसे लेकर खबरें छापने या दिखाने के कलंकों के बाद अब मीडिया को और छूट नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि हर तरह की छूट दरअसल पत्रकारिता या मीडिया के लिए नहीं होती, ना ही वह उसके कर्मचारियों के लिए होती है, यह सारी छूट होती है मालिकों के लिए। सो नियम ऐसे हों जिससे मीडिया कर्मी निर्भय होकर, प्रतिबद्धता के साथ अपना काम कर सकें। केंद्र सरकार अगर चैनलों की भीड़ रोकने और उन्हें नियमों में बांधने के लिए आगे आ रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। ध्यान रहे यह मामला सेंसरशिप का नहीं हैं। पत्रकारों के कल्याण, उनके जीवन से भी जुड़ा है, सो इस मुद्दे पर एलर्जिक होना ठीक नहीं है। ( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Friday, March 12, 2010

मीडिया के विस्तार में सहायक बनी नई प्रौद्योगिकी


- संजय द्विवेदी


बात अगर नई तकनीक और प्रौद्योगिकी की करें तो उसने अखबारों की ताकत और उर्जा का विस्तार ही किया है। अखबारों का नया रूप ज्यादा स्वीकार्य, सुदर्शन और व्यापक हुआ है तो इसके पीछे इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी का विकास ही है। सूचना की दुनिया की बढ़ती गति ने अखबारों के कार्यालयों का स्वरूप बदल गया। खबरें ज्यादा तेजी से, ज्यादा सज-धज के सामने आने लगीं। कम्प्यूटर पर पेजमेकिंग के नित नए साफ्टवेयर्स ने अखबारों को बेहद सजीला बना दिया है। आंचलिक अखबारों की बढ़ी ताकत और उनके नित नए संस्करणों का विकास दरअसल सूचना प्रौद्योगिकी और प्रिटिंग टेक्नालाजी में आए बदलावों के चलते ही संभव हुआ है। इसी आईटी क्रांति ने भाषाई पत्रकारिता को नवजीवन और नया जोश दिया है। यह दरअसल भारत जैसे देश के लिए एक नई परिघटना है। तेजी से बढ़ती साक्षरता, लोगों की बढ़ती क्रयशक्ति और स्टेटस सिंबल के रूप में बदलते अखबार एक ऐसी घटना है जिसे समझना जरूरी है। शायद यही कारण है कि भारत प्रिंट मीडिया के सबसे बड़े विश्वबाजार के रूप में उभर रहा है।
ये विकास का पहला चरण है, विकास का यह दौर अभी शुरू हुआ है जाहिर तौर पर वह लंबा खिचेंगा। विद्वानों की मानें तो भारतीय प्रिंट मीडिया को अभी दस या पंद्रह सालों तक कोई गंभीर चुनौती बेब माध्यम प्रस्तुत कर पाएंगें ऐसा नहीं लगता। लेकिन क्या दूसरे चरण में भी अखबारों की यह विकासयात्रा जारी रह पाएगी यह सवाल सबके सामने है। दस या पंद्रह साल बाद ही सही अखबारों के सामने चुनौती के रूप में वेब माध्यम का विकास तो हो ही रहा है। वह कुछ प्रतिशत में ही सही, अखबार को सूचना का प्राथमिक श्रोत तो नहीं ही रहने देगा। आज यह आंकड़ा बहुत कम जरूर है किंतु यह तेजी से बढ़नेवाला है इसे मान लेना चाहिए। हम इसे आज की युवा पीढ़ी जो शहरों में रह रही है कि बदलती आदतों से समझ सकते हैं कि वह किस माध्यम के ज्यादा करीब है। इंटरनेट के अविष्कार ने इसे एक ऐसी शक्ति दी जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। वेबसाइट्स के निर्माण से ई-रीडिंग का प्रचलन भी बढ़ा है । हमारे पुस्तकालय खाली पड़े होंगे किंतु साइबर कैफै युवाओं से भरे-पड़े हैं। एक क्लिक से उन्हें दुनिया जहान की तमाम जानकारियां और साहित्य का खजाना मिल जाता है। यह सही है उनमें चैटिंग और पोर्न साइट्स देखनेवालों की भी एक बड़ी संख्या है किंतु यह मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि नई पीढ़ी आज भी ज्यादातर सूचना या पाठ्य सामग्री की तलाश में इन साइट्स पर विचरण करती है। तकनीक कभी भी किसी विधा की दुश्मन नहीं होती, वह उसके प्रयोगकर्ता पर निर्भर है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करता है। नई तकनीक ने सूचनाओं का कवरेज एरिया तो बढ़ा ही दिया ही साथ ही ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों के प्रति युवाओं की पहुंच का विस्तार भी किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। यह सारा कुछ हमारे पढने के समय की ही चोरी है। परंपरागत तरीके के अध्ययन से यह तरीका अलग है। अखबार तो नेट और मोबाइल पर पढ़े जा सकते हैं, आपके टीवी सेट पर भी देखे जा सकते हैं।
अखबारों की पठनीयता पर कोई गंभीर अध्ययन कराया जाए तो इसके सही निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। अखबार शहरी क्षेत्रों में पढ़े नहीं, पलटे जा रहे हैं। फिर इनके प्रसार बढ़ने का कारण क्या है। सही मानें तो अखबार एक स्टेटस सिंबल में बदल गए हैं। पढ़ने के मातृभाषा का अखबार और डायनिंग हाल में रखने को अंग्रेजी का अखबार। चार लोगों के रहने वाले घर में भी दो या चार अखबार आसानी से आते हैं। बढ़ती क्रय शक्ति भी इसका उत्प्रेरक तत्व बनी है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती साक्षरता प्रेरक तत्व बनी है। सूचना पाने की उत्कंठा आज समाज के हर वर्ग में हैं। कंप्यूटर साक्षरता की धीमी गति, बिजली की कम उपल्ब्धता, मंहगे कंप्यूटर धीमी इंटरनेट कनेक्टिविटी ने अखबारों के लिए जीवनदान का काम किया है। आपको टीवी देखते, इंटरनेट पर विचरण करते युवाओं की टोली मिल जाएगी पर अखबार को धर्मग्रंथ की तरह बांचते अब प्रौढ़ या वृद्ध ही दिखते हैं।
इस तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के नाते उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस मामले में इंटरनेट अभी ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्च भी कम है और ब्लाग तो निःशुल्क ही हैं। सो एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति को सुलभ मानता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहां सीधा औऱ सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक है इसके चलते वेबमाध्यम अभी उतने प्रभावी नहीं दिखते, पर यह तकनीक सही मायने निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तेमाल ने एक अनजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपना ब्लाग मुफ्त में ही बनाकर अपनी रचनाशीलता से दूर बैठे अपने दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। भारत जैसे देश में जहां साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के इंतजाम से जीवित रह सकता है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि इस पत्रिका का टिका रहना, विपणन रणनीति पर नहीं, उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। वेबसाइट्स पर चलने वाली पत्रिकाएं और सूचनाप्रधान अखबार अपनी गुणवत्ता से जीवित रहते हैं जबकि प्रिंट पर छपने वाली पत्रिकाएं और अखबार अपनी विपणन रणनीति और अर्थ प्रबंधन की कुशलता से ही दीर्धजीवी हो पाते हैं। सो साहित्य के अनुरागी जनों के लिए ब्लाग जहां एक मुफ्त की जगह उपलब्ध कराता है वहीं इस माध्यम पर नियमित पत्रिका या विचार के फोरम मुफ्त चलाए जा सकते हैं। इसमें गति भी है और गुणवत्ता भी। इस तरह बाजार की संस्कृति का विस्तारक होने की आरोपी होने के बावजूद आप इस माध्यम पर बाजार के खिलाफ, उसकी अपसंस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। इस मायने में यह बेहद लोकतांत्रिक माध्यम भी है। इसने पत्राचार की संस्कृति को ई-मेल के जरिए लगभग खत्म तो कर दिया है पर गति बढ़ा दी है, इसे सस्ता भी कर दिया है।
सही मायने में अभी हिंदी समाज को ई-संस्कृति विकसित होने का इंतजार करना पड़ेगा। इसके चलते भले ही प्रिंट माध्यम अपनी उपयोगिता बनाए रख सकते हैं। बावजूद हिंदी का यह बन रहा विश्व समाज हमें नए मीडिया के द्वारा खोले गए अवसरों के उपयोग करने वाली पीढ़ी तैयार कर रहा है। हिंदी का श्रेष्ठ साहित्य न्यू मीडिया में अपनी जगह बना सके इसके प्रयास हो रहे हैं। इंटरनेट ने प्रायः उन विधाओं और विषयों को फोकस किया है जो प्रायः मुख्यधारा के मीडिया से गायब हो रहे हैं। प्रिंट में अनुपस्थित बहुत सी विधाओं और विषयों पर इंटरनेट पर गंभीर विमर्श देखे जा रहे हैं। सो यह माध्यम देर-सबेर एक चुनौती के रूप में सामने तो खड़ा है ही। भारत के प्रायः सभी अखबार आज अपनी वेबसाइट बना चुके हैं इसका मतलब यह है कि उन्होंने इस माध्यम की स्वीकार्यता को समझ लिया है। इसके साथ ही कई अखबार मोबाइल पर भी खबरें दे रहे हैं। सो प्रिंट माध्यम के धराने एक साथ रेडियो, टीवी, फिल्म, मोबाइल न्यूज,वेबमाध्यम सभी में प्रवेश कर रहे हैं। इससे एक माध्यम दूसरे माध्यम को चुनौती भी देता हुआ दिखता है तो सहयोगी की भूमिका में भी है। इसे प्रिंट माध्यमों से जुड़े घरानों का विस्तारवाद तो कहा ही जा सकता है पर इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि इन घरानों ने प्रिंट माध्यम या अखबारों की सीमाएं समझ ली हैं। आने वाला समय सूचना के विविध माध्यमों में आपसी संघर्ष के गवाह बनेगा जिसे देखना निश्चय ही रोचक होगा।