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Wednesday, December 29, 2010

बात तो साफ हुई कि मीडिया देवता नहीं है !



-संजय द्विवेदी
यह अच्छा ही हुआ कि यह बात साफ हो गयी कि मीडिया देवता नहीं है। वह तमाम अन्य व्यवसायों की तरह ही उतना ही पवित्र व अपवित्र होने और हो सकने की संभावना से भरा है। 2010 का साल इसलिए हमें कई भ्रमों से निजात दिलाता है और यह आश्वासन भी देकर जा रहा है कि कम से कम अब मीडिया के बारे में आगे की बात होगी। यह बहस मिशन और प्रोफेशन से निकलकर बहुत आगे आ चुकी है।
इस मायने में 2010 एक मानक वर्ष है जहां मीडिया बहुत सारी बनी-बनाई मान्यताओं से आगे आकर खुद को एक अलग तरह से पारिभाषित कर रहा है। वह पत्रकारिता के मूल्यों, मानकों और परंपराओं का भंजन करके एक नई छवि गढ़ रहा है, जहां उससे बहुत नैतिक अपेक्षाएं नहीं पाली जा सकती हैं। कुछ अर्थों में अगर वह कोई सामाजिक काम गाहे-बगाहे कर भी गया तो वह कारपोरेट्स के सीएसआर (कारपोरेट सोशल रिस्पांस्बिलिटी) के शौक जैसा ही माना जाना चाहिए। मीडिया एक अलग चमकीली दुनिया है। जो इसी दशक का अविष्कार और अवतार है। उसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के गर्भनाल में मत खोजिए, यह दरअसल बाजारवाद के नए अवतार का प्रवक्ता है। यह उत्तरबाजारवाद है। इसे मूल्यों, नैतिकताओं, परंपराओं की बेड़ियों में मत बांधिए। यह अश्वमेघ का धोड़ा है,जो दुनिया को जीतने के लिए निकला है। देश में इसकी जड़ें नहीं हैं। वह अब संचालित हो रहा है नई दुनिया के,नए मानकों से। इसलिए उसे पेडन्यूज के आरोपो से कोई उलझन, कोई हलचल नहीं है, वह सहज है। क्योंकि देने और लेने वालों दोनों के लक्ष्य इससे सध रहे हैं। लोकतंत्र की शुचिता की बात मत ही कीजिए। यह नया समय है,इसे समझिए। मीडिया अब अपने कथित ग्लैमर के पीछे भागना नहीं चाहता। वह लाभ देने वाला व्यवसाय बनना चाहता है। उसे प्रशस्तियां नहीं चाहिए, वह लोकतंत्र के तमाम खंभों की तरह सार्वजनिक या कारपोरेट लूट में बराबर का हिस्सेदार और पार्टनर बनने की योग्यता से युक्त है।
मीडिया का नया कुरूक्षेत्रः
मीडिया ने अपने कुरूक्षेत्र चुन लिए हैं। अब वह लोकतंत्र से, संवैधानिक संस्थाओं से, सरकार से टकराता है। उस पर सवाल उठाता है। उसे कारपोरेट से सवाल नहीं पूछने, उसे उन लोगों से सवाल नहीं पूछने जो मीडिया में बैठकर उसकी ताकत के व्यापारी बने हैं। वह सवाल खड़े कर रहा है बेचारे नेताओं पर,संसद पर जो हर पांच साल पर परीक्षा के लिए मजबूर हैं। वह मदद में खड़ा है उन लोगों के जो सार्वजनिक धन को निजी धन में बदलने की स्पर्धा में जुटे हैं। बस उसे अपना हिस्सा चाहिए। मीडिया अब इस बंदरबांट पर वाच डाग नहीं वह उसका पार्टनर है। उसने बिचौलिए की भूमिका से आगे बढ़कर नेतृत्व संभाल लिया है। उसे ड्राइविंग सीट चाहिए। अपने वैभव, पद और प्रभाव को बचाना है तो हमें भी साथ ले लो। यह चौथे खंभे की ताकत का विस्तार है। मीडिया ने तय किया है कि वह सिर्फ सरकारों का मानीटर है, उसकी संस्थाओं का वाच डाग है। आप इसे इस तरह से समझिए कि वह अपनी खबरों में भी अब कारपोरेट का संरक्षक है। उसके पास खबरें हैं पर किनकी सरकारी अस्पतालों की बदहाली की, वहां दम तोड़ते मरीजों की,क्योंकि निजी अस्पतालों में कुछ भी गड़ब़ड़ या अशुभ नहीं होता। याद करें कि बीएसएनएल और एमटीएनएल के खिलाफ खबरों को और यह भी बताएं कि क्या कभी आपने किसी निजी मोबाइल कंपनी के खिलाफ खबरें पढ़ी हैं। छपी भी तो इस अंदाज में कि एक निजी मोबाइल कंपनी ने ऐसा किया। शिक्षा के क्षेत्र में भी यही हाल है। सारे हुल्लड़-हंगामे सरकारी विश्वविद्यालयों, सरकारी कालेजों और सरकारी स्कूली में होते हैं- निजी स्कूल दूध के धुले हैं। निजी विश्वविद्यालयों में सारा कुछ बहुत न्यायसंगत है। यानि पूरा का पूरा तंत्र,मीडिया के साथ मिलकर अब हमारे जनतंत्र की नियामतों स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी तंत्र को ध्वस्त करने पर आमादा है। साथ ही निजी तंत्र को मजबूत करने की सुनियोजित कोशिशें चल रही हैं। मीडिया इस तरह लोकतंत्र के प्रति, लोकतंत्र की संस्थाओं के प्रति अनास्था बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है, क्योंकि उसके व्यावसायिक हित इसमें छिपे हैं। व्यवसाय के प्रति लालसा ने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। मीडिया संस्थान,विचार के नकली आरोपण की कोशिशों में लगे हैं ।यह मामला सिर्फ चीजों को बेचने तक सीमित नहीं है वरन पूरे समाज के सोच को भी बदलने की सचेतन कोशिशें की जा रही हैं। शायद इसीलिए मीडिया की तरफ देखने का समाज का नजरिया इस साल में बदलता सा दिख रहा है।
यह नहीं हमारा मीडियाः
इस साल की सबसे बड़ी बात यह रही कि सूचनाओं ने, विचारों ने अपने नए मुकाम तलाश लिए हैं। अब आम जन और प्रतिरोध की ताकतें भी मानने लगी हैं मुख्यधारा का मीडिया उनकी उम्मीदों का मीडिया नहीं है। ब्लाग, इंटरनेट, ट्विटर और फेसबुक जैसी साइट्स के बहाने जनाकांक्षाओं का उबाल दिखता है। एक अनजानी सी वेबसाइट विकिलीक्स ने अमरीका जैसी राजसत्ता के समूचे इतिहास को एक नई नजर से देखने के लिए विवश कर दिया। जाहिर तौर पर सूचनाएं अब नए रास्तों की तलाश में हैं. इनके मूल में कहीं न कहीं परंपरागत संचार साधनों से उपजी निराशा भी है। शायद इसीलिए मुख्यधारा के अखबारों, चैनलों को भी सिटीजन जर्नलिज्म नाम की अवधारणा को स्वीकृति देनी पड़ी। यह समय एक ऐसा इतिहास रच रहा है जहां अब परंपरागत मूल्य, परंपरागत माध्यम, उनके तौर-तरीके हाशिए पर हैं। असांजे, नीरा राडिया, डाली बिंद्रा,, राखी सावंत, शशि थरूर, बाबा रामदेव, राजू श्रीवास्तव जैसे तमाम नायक हमें मीडिया के इसी नए पाठ ने दिए हैं। मीडिया के नए मंचों ने हमें तमाम तरह की परंपराओं से निजात दिलाई है। मिथकों को ध्वस्त कर दिया है। एक नई भाषा रची है। जिसे स्वीकृति भी मिल रही है। बिग बास, इमोशनल अत्याचार, और राखी का इंसाफ को याद कीजिए। जाहिर तौर पर यह समय मीडिया के पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है। यह समय विकृति को लोकस्वीकृति दिलाने का समय है। इसलिए मीडिया से बहुत अपेक्षाएं न पालिए। वह बाजार की बाधाएं हटाने में लगा है। तो आइए एक बार फिर से हम हमारे मीडिया के साथ नए साल के जश्न में शामिल हो जाएं।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Friday, August 6, 2010

रचना और संघर्ष का सफरनामाः राजेंद्र माथुर


जयंती ( 7 अगस्त) पर खासः -संजय द्विवेदी

राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया एकाएक नहीं पाया। संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया, अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को उंचाईयों पर ले जाने का उसका संकल्प कितना गहरा है। हमारे समय के प्रश्नों के जबाव तलाशने और नए सवाल खड़े की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही है वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरूष बनकर सामने आते है जिसने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया। हिंदी को एक ऐसी भाषा और विराट अनुभव संसार दिया जिसकी प्रतीक्षा में वह सालों से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक- “ माथुर साहब जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।”
श्री बाली लिखते हैं कि “वह एक ऐसा संपादक है जिसके मन-समुद्र में विचारों की लहरें एक के बाद एक लगातार, अनवरत उठती हैं, कोई लहर किसी दूसरी लहर को नष्टकर आगे बढ़ने के अहंकार का शिकार नहीं है। और पूनम की कोई ऐसी भली रात हर महीने आती है जब ये लहरें किसी विराट-सर्वोच्च को छू लेने को बेताब हो उठती हैं।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आर्कषण दिखता है। उनके लेखन में भारत जिज्ञासा, भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होता है। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि –“ राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता के उस संधिकाल में संपादक के रूप में सामने आए थे, जब हिंदी अखबार अपने पुरखों के पुण्य के संचित कोष को बढ़ा नहीं पा रहे थे। यह जमा पूंजी इतनी नहीं थी कि हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं व्यावसायिकता की बढ़ती हुयी चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे बाजार के दबाव से बचा सकें। राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान बना सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य से प्रकाशित उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्बुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगें। ”
राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थित ही नई दुनिया और नवभारत टाइम्स को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुयी जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है।नवभारत टाइम्स में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि- “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई शैली या लहजा नहीं था वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकी आदेशों या हुकमों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती थी। वे एक आणविक ताप या विद्युत संयत्र की तरह बेहद चुपचाप काम करते थे, जो अपने प्रभाव से लगभग उदासीन रहता है। लेकिन वे बेहद परिश्रमी संपादक थे और शायद एक या दो उपसंपादकों की मदद से एक दस पेज का अखबार रोज निकाल सकते थे। वे अजातशत्रु और धर्मराज युधिष्ठिर जैसे थे लेकिन जरूरत पड़ने पर वज्र की तरह कठोर भी हो सकते थे।” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराईयों से उनका व्यक्तित्व बेहद अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गयी हैं श्री माथुर उसमें फिट बैठते हैं। उनका व्यक्तित्व बौद्धिक उंचाइयां लिए हुए था। अपनी पत्रकारिता को कुछ पाने और लाभ लेने की सीढ़ी बनाना उन्हें नहीं आता था। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में वे जिस समय दिल्ली में नवभारत टाइम्स जैसे बड़े अखबार के संपादक थे तो वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह उंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं।
विष्णु खरे उनके इन्हीं व्यक्तित्व की खूबियों को रेखांकित करते हुए कहते हैं- “राजेंद्र माथुर का जीवन और उनके कार्य एक खुली पुस्तक की तरह थे। कानाफूसी, चुगलखोरी, षडयंत्र, झूठ-फरेब, मक्कारी, उनके स्वभाव में थे ही नहीं। वे किसी चीज को गोपनीय रखना ही नहीं चाहते थे और अक्सर कई ऐसी सूचनाएं निहायत मामूली ढंग से देते थे, जिनपर दूसरे लोग कारोबार कर लेते हैं। इसलिए उनसे बातें करना बेहद असुविधाजनक स्थितियां पैदा कर देता, क्योंकि वे कभी भी किसी के द्वारा कही गयी बात को जगजाहिर कर देते थे और वह व्यक्ति अपना मुंह छिपाता फिरता था। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी और भारतीय तथा विश्व राजनीति में सतही और चालू दिलचस्पी न रखने के बावजूद राष्ट्रीय व विदेशी घटनाक्रम तथा इतिहास में उनकी पैठ आश्चर्यजनक थी। एक सच्चे पत्रकार की तरह उनमें जमाने भर के विषयों के बारे में जानकारी थी और वे घंटों अपने प्रबुद्ध श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रख सकते थे। नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगें इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ और मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों में तक राजेंद्र माथुर एटीटर्स गिल्ड आफ इंडिया जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे।” उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे जो लगातार यह सोचता रहा कि हिंदी पत्रकारिता का विचार दारिद्रय कैसे दूर किया जाए। कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले और उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक रहे स्व.सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था और वे लिखते हैं- “माथुर साहब का गहन इतिहासबोध, शुद्ध श्रध्दा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवी स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।”
उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती है। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत प्रेम, भारत बोध और हिंदी प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं- “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एमए किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद नवभारत टाइम्स को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सार्मथ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे। शब्दों का कारोबार करने वाले हमारे जैसे अनपढ़ों और बौद्धिक संस्कारहीनों के साथ तो नियति ने सचमुच अन्याय किया है। उनके लेखन से हम जैसे लोगों को एक दृष्टि तो मिलती ही थी, ज्ञान का वह विपुल भंडार भी कभी बातचीत से तो कभी उनके लेखन से टुकड़ों-टुकड़ों में मिल जाता था, जो प्रायः अंग्रेजी में ही उपलब्ध है और जिसे पढ़कर पचा लेना प्रायः कठिन होता है।”
पत्रकारीय सहयोगियों और मित्रों की नजर से देखें तो राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय व्यक्तित्व की कुछ खूबियां साफ नजर आती हैं। जैसे वे बेहद अध्ययनशील संपादक एवं पत्रकार हैं। उनका अध्ययन और विषयों के प्रति उनके ज्ञान की गहराई उन्हें अपने सहयोगियों के बीच अलग ही व्यक्तित्व दे देती है। दूसरे उनका लेखन भारतीयता और उसके मूल्यों को समर्पित है। तीसरा है उनके मन में किसी प्रकार की पदलाभ की कामना नहीं है। वे अपने काम के प्रति समर्पित हैं और किसी राजनीति का हिस्सा नहीं हैं। चौथा उनमें मानवीय गुण भरे हुए हैं जिसके चलते वे मानवीय कमजोरियों और पद के अहंकार के शिकार नहीं होते। इसके चलते एक बड़े अखबार के संपादक का पद, रूतबा और अहं उन्हें छू नहीं पाता। यह उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता है जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली कहते हैं- “हमारे प्रधान संपादक को को पांचवा कोई काम आता है, इसमें तो मुझे पूरा शक हैः बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ समाने आता है। जिसमें एक बौद्धिक तेज और आर्कषण निरंतर दिखता है। जाहिर तौर पर ऐसे उदाहरण आने वाली पत्रकार पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं कि किस तरह उन्होंने अपने को तैयार किया। असहज और वैश्विक सवालों पर इतनी कम आयु में लेखन शुरू कर अपनी देशव्यापी पहचान बनाई। शायद इसीलिए देश के दो महत्वपूर्ण अखबारों नई दुनिया और नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक पद तक वे पहुंच पाए। यह यात्रा एक ऐसा सफर है जिसमें श्री माथुर ने जो रचा और लिखा वह आज भी पत्रकारिता की पूंजी और धरोहर है। पत्रकारिता का लेखन सामयिक होता है उसकी तात्कालिक पहचान होती है। श्री माथुर के पत्रकारीय लेखन के बहाने हर हम लगभग चार दशक की राजनीति, उसकी समस्याओं और चिंताओं से रूबरू होते हैं। यह एक दैनिक इतिहास की तरह का लेखन है जिससे हम अपने विगत में झांक सकते हैं और गलतियों से सबक लेकर नए रास्ते तलाश सकते हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक संपादक के तौर पर सामने आते हैं जो पूर्णकालिक पत्रकार हैं। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। सो उन्होंने हिंदी पत्रकारिता पर साहित्यकार संपादकों द्वारा दी गयी भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अलग पत्रकारीय भाषा का अनुभव हमें दिया। हिंदी को संवाद को,संचार की, सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं जिसने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव के विषय बनाया जिनपर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावना से उपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। जिसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया। इससे हिंदी पत्रकारिता एक आत्मविश्वास हासिल हुआ। उसे एक नई ऊर्जा मिली। आज हिंदी पत्रकारिता में जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गयी है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ रास्ते निकाल पाएं जो हमें इस कठिन समय में लड़ने और मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सके।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Friday, June 18, 2010

नहीं संभले तो यह कालिख हमें ले डूबेगी

पेड न्यूज के सवाल पर चुनाव आयोग के रूख का स्वागत कीजिए
सच मानिए यह कालिख हमें ले डूबेगी। पेड न्यूज की खबरों ने जितना और जैसा नुकसान मीडिया को पहुंचाया है, उतना नुकसान तो आपातकाल में घुटने टेकने पर भी नहीं हुआ था। चुनावी कवरेज के नाम पर यह एक ऐसी लूट थी जिसमें हम सब शामिल थे। इस लूट ने हमारे सिर शर्म से झुका दिए थे। नौकरी की मजबूरियों में खामोश पत्रकार भी अंदर ही अंदर बिलबिला रहे थे। पर हमारे मालिकों की बेशर्मी ऐसी कि एक ने कहा कि “सबको दर्द इसलिए हो रहा है कि पैसा हिंदी वालों को मिला। ” इस गंदे पैसे से हिंदी की सेवा करने के लिए आतुर इन महान मालिकों से किसने कहा कि वे राष्ट्रभाषा में अखबार निकालें। कोई और काम या व्यापार करते हुए, जाकर उन्हीं नेताओं से पैसे मांगकर देखें, जो मजबूरी में मालिक संपादकों को सिर पर बिठाते हैं। एक बार अखबार का विजिटिंग कार्ड न होगा तो सारे काले-पीले काम बंद हो जाएंगे, यह तो उन्हें जानना ही चाहिए। अपनी विश्वसनीयता और प्रामणिकता को दांव को लगाकर सालों से अर्जित भाषाई पत्रकारिता के पुण्य पर पेड न्यूज का ग्रहण जितनी जल्दी हटे बेहतर होगा। शायद इसीलिए चुनाव आयोग ने पेड न्यूज पर मचे बवाल पर चिंता जताते हुए यह तय किया है कि अब आयोग ऐसे विज्ञापनों की निगरानी करेगा।
पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पेड न्यूज का मुद्दा खासा विवादों में आया था जब तमाम समाचार पत्र समूहों और टीवी चैनलों ने मोटी रकम उम्मीदवारों से लेकर उनके पक्ष में समाचार छापे और दिखाए थे। हालात यह थे कि पैसे के आधार पर छपी खबरों में यह पहचानना मुश्किल था कि कौन सा समाचार है और कौन सा विज्ञापन। यह बहुत राहत देने की बात है कि इसके खिलाफ मीडिया से जुड़े लोगों ने ही आवाज उठायी और इसे एक बड़े संकट के रूप में निरूपित किया। हमारे समय के बड़े पत्रकार स्वा. प्रभाष जोशी इस विषय पर पूरे देश में अलख जागते हुए ही विदा हुए। जाहिर तौर पर यह एक ऐसी प्रवृत्ति थी जिसका विरोध होना ही चाहिए। क्योंकि आखिर जब छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता ही नहीं रहेगी तो उसका मतलब क्या है। ऐसे में तमाम राजनेता, पत्रकार, समाजसेवी, बुद्धिजीवी इस चलन के खिलाफ खड़े हुए। सत्ता और मीडिया के बीच बहुत सरस संबंधों से वैसे भी सच कहीं दुबक कर रह जाता है। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव पर भी अगर हमारे अखबार झूठ की बारिश करेंगें तो पत्रकारिता की शुचिता, पवित्रता और प्रामणिकता कहां बचेगी। ऐसे कठिन समय में चुनाव आयोग का इस तरफ ध्यान देना बहुत स्वाभाविक था। आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यचुनाव अधिकारियों को दिए अपने निर्देश में जिला निर्वाचन अधिकारियों से इस मामले में मीडिया पर कड़ी नजर रखने को कहा है।आयोग ने कहा कि जिले में प्रसारित और प्रकाशित होने वाले सभी समाचार पत्रों की कड़ी जांच पड़ताल के लिए चुनाव की धोषणा होते ही जिला स्तरीय समितियों का गठन जिला निर्वाचन अधिकारी कर सकते हैं। ताकि न्यूज कवरेज की आड़ में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों का पता लगाया जा सके। चुनाव आयोग ने यह भी व्यवस्था दी है कि जिला निर्वाचन अधिकारियों को करीब से प्रिंट मीडिया में जारी होने वाले विज्ञापनों पर नजर रखनी चाहिए जिनमें समाचार के रूप में छद्म विज्ञापन हों और जहां जरूरत हो उन मामलों में उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को नोटिस दिए जाएं ताकि इस मद में आने वाला खर्च संबंधित उम्मीदवार या पार्टी के चुनाव खर्च में डाला जा सके। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को हाल में ही उनके खिलाफ पेड न्यूज के एक मामले में नोटिस दिया गया था। चुनाव आयोग की यह सक्रियता बताती है उसका इन खतरों की तरफ ध्यान है और वह चुनावों को साफ-सुथरे ढंग से कराने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में हमारे राजनेता, राजनीतिक दलों और मीडिया समूहों तीनों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। स्वच्छ चुनावों के लिए हमारे राजनेताओं की प्रतिबद्धता के बिना प्रयास सफल न होंगें। देश के मीडिया ने तमाम राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया है। उसके सचेतन प्रयासों से लोकतंत्र के प्रति जनविश्वास बढ़ा है।
ऐसे में पेड न्यूज की विकृति स्वयं मीडिया के प्रति जनविश्वास का क्षरण करेगी। ऐसे में मीडिया समूहों को स्वयं आगे आकर अपनी प्रामणिकता और विश्वसनीयता की रक्षा करनी चाहिए। ताकि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को इस तरह के नियमन की जरूरत ही न पड़े। उम्मीद है मीडिया के हमारे नियामक इन बदनामियों से नाम कमाने के बजाए पूंजी अर्जन के कुछ नए रास्ते निकालेंगे। हमारे लोकतंत्र को नेताओं ने लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया है, किंतु इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि नेताओं की लूट में मीडिया का भी हिस्सा है। मीडिया ने यह समझा कि नेताजी काफी कमाया है सो उस लूट के माल में हमारा भी हिस्सा है। जाहिर तौर पर इस लूट में शामिल होने के बाद आप नैतिकता और समाज के पहरूए की भूमिका खो देते हैं। मीडिया को किसी कीमत पर यह छूट नहीं दी जानी कि वह किसी तरह की सरकारी या गैर सरकारी लूट का हिस्सा बने। अगर मीडिया के मालिक ऐसा करते हैं तो वे सालों-साल से अर्जित पुण्यफल का क्षरण ही कर रहे हैं और ऐसे आचरण से उनके अखबार पोस्टर में बदल जाएंगें। उन्हें जो जनविश्वास अर्जित है उसका क्या होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारा मीडिया नई लीक पर चल अपने आत्मविश्वास को न खोते हुए अपनी आत्मनिर्भरता के लिए नए रास्ते तलाशेगा ताकि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को इस तरह के नियमन की जरूरत न पड़े। ताकि मीडिया को लोकतंत्र को मजबूत करने वाली संस्था के रूप में देखा जाए न की लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाले माध्यम के रूप में उसे आरोपित किया जाए। बेहतर होगा कि मीडिया सत्ता और सत्ता और राजनीति के साथ आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ता बनाए, क्योंकि यही बात उसके पक्ष में है और उसकी प्रामणिकता को बचाए व बनाए रखने में सहायक भी।

Thursday, April 22, 2010

मीडिया विमर्श का अगला अंक नक्सलवाद पर


भोपाल। देश की प्रतिष्ठित पत्रिका मीडिया विमर्श का अगला अंक नक्सलवाद और मीडिया विषय पर केंद्रित है। इस अंक का प्रकाशन अप्रैल के आखिरी सप्ताह में हो जाएगा। इस महत्वपूर्ण अंक में देश के तमाम दिग्गज पत्रकारों के लेख प्रकाशित किए गए हैं। जिसमें नक्सलवाद की चुनौती से जूझने के प्रयासों पर सार्थक बातचीत की गयी है। इस अंक के महत्वपूर्ण लेखकों में सर्वश्री रमेश नैयर, बसंत कुमार तिवारी, डा. महावीर सिंह, डा. श्रीकांत सिहं, धनंजय चोपड़ा, कनक तिवारी, डा. सुभद्रा राठौर, अनिल विभाकर, उमाशंकर मिश्र, संदीप भट्ट, अबू तोराब, प्रकाश दुबे, डा. शाहिद अली, डा. पवित्र श्रीवास्तव, मीता उज्जैन, लीना और संजय द्विवेदी शामिल हैं। इस अंक का मूल्य 25 रूपए है। इसकी प्रति प्राप्त करने के लिए मीडिया विमर्श के भोपाल कार्यालय- 428, रोहित नगर, फेज-1, ई-8 एक्सटेंशन, भोपाल -39 पर संपर्क किया जा सकता है। यह पत्रिका आप पचीस रूपए की डाक टिकट या मनीआर्डर भेज कर भी प्राप्त कर सकते हैं।

Saturday, March 13, 2010

ताकि बेमौत न मारे जाएं मीडियाकर्मी


इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाना जरूरी
- संजय द्विवेदी
मीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं।
अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है। जिसमें मीडिया की प्रामणिकता, विश्वसनीयता की चिंताएं तो हैं ही साथ ही उन पत्रकारों का जीवन भी एक अहम मुद्दा है जो अपना कैरियर इन नए-नवेले चैनलों के लिए दांव पर लगा देते हैं। चैनलों की बाढ़ ने न सिर्फ उनकी साख गिरायी है वरन मीडिया के क्षेत्र को एक अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की यह चिंता बहुत स्वाभाविक है कि कैसे इस क्षेत्र में मचे धमाल को रोका जाए। दिसंबर,2008 तक देश में कुल 417 चैनल थे जिसमें 197 न्यूज चैनल काम कर रहे थे। सितंबर,2009 तक सरकार 498 चैनलों के लिए अनुमति दे चुकी है और 150 चैनलों के नए आवेदन विचाराधीन हैं। टीवी मीडिया के क्षेत्र में जाहिर तौर पर यह एक बड़ी छलांग है। कितु क्या इस देश को इतने सेटलाइट चैनलों की जरूरत है। क्या ये सिर्फ धाक बनाने और निहित स्वार्थों के चलते खड़ी हो रही भीड़ नहीं है। जिसका पत्रकार नाम के प्राणी के जीवन और पत्रकारिता के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस दौर में दिल्ली जैसी जगह में हजारों पत्रकार अकारण बेरोजगार बना दिए गए हों और तमाम चैनलों में लोग अपनी तनख्वाह का इंतजार कर रहे हों इस अराजकता पर रोक लगनी ही चाहिए।
यह बहुत बेहतर है कि सरकार इस दिशा में कुछ नियमन करने के लिए सोच रही है। चैनल अनुमति नीति में बदलाव बहुत जरूरी हैं। यह सामयिक है कि सरकार अपने अनुमति देने के नियमों की समीक्षा करे और कड़े नियम बनाए जिसमें कर्मचारी का हित प्रधान हो। ताकि लूट-खसोट के इरादे से आ रहे चैनलों को हतोत्साहित किया जा सके। सरकार ने ट्राइ को लिखा है कि वह उसे इसके लिए सुझाव दे कि और कितने चैनलों की गुंजाइश इस देश में है और चैनलों की बढ़ती संख्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। अपने पत्र में मंत्रालय की चिंता वास्तव में देश की भी चिंता है। पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि नए चैनल शुरू करने वालों में बिल्डर,ठेकेदार, शिक्षा क्षेत्र में व्यापार करने वाले, स्टील व्यापारी समेत तमाम ऐसे लोग हैं जिनका मीडिया उद्योग से कोई लेना देना या पूर्व अनुभव नहीं है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह भी शिकायत मिली है चैनल शुरू करवाने को लेकर दलाली का एक पूरा कारोबार जोर पकड़ चुका है। उल्लेखनीय है कि चैनल शुरू करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय की अनुमति भी लेनी होती है।
हालांकि कुछ आलोचक यह कह कर इन कदमों की आलोचना कर सकते हैं कि यह कदम लोकतंत्र विरोधी होगा कि नए चैनल आने में अड़चनें लगाई जाएं। किंतु जिस तरह के हालात हैं और पत्रकारों व कर्मियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा रहा है उसमें नियमन जरूरी है। चैनल का लाइसेंस पाकर कभी भी चैनल पर ताला डालने का प्रवृत्ति से आम पत्रकारों को गहरा झटका लगता है। उनके परिवार सड़क पर आ जाते हैं। नौकरियों को लेकर कोई सुरक्षा न होना और पत्रकारों से अपने संपर्कों के आधार पर पैसै या व्यावसायिक मदद लेने की प्रवृत्ति भी उफान पर है। चैनल खोलने के शौकीनों से सरकार को यह जानने का हक है कि आखिर वे ऐसा क्या प्रमाण दे रहे हैं कि जिसके आधार पर यह माना जा सके कि आपके पास तीन या पांच साल तक चैनल चलाने की पूंजी मौजूद है। वित्तीय क्षमता के अभाव या मीडिया के दुरूपयोग से पैसे कमाने की रूचि से आने वालों को निश्चित ही रोका जाना चाहिए। चैनल में नियुक्त कर्मियों के रोजगार गारंटी के लिए कड़े नियमों के आघार पर ही नए नियोक्ताओं को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलनी चाहिए। मीडिया जिस तरह के उद्योग में बदल रहा है उसे नियमों से बांधे बिना कर्मियों के हितों की रक्षा असंभव है। पैसे लेकर खबरें छापने या दिखाने के कलंकों के बाद अब मीडिया को और छूट नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि हर तरह की छूट दरअसल पत्रकारिता या मीडिया के लिए नहीं होती, ना ही वह उसके कर्मचारियों के लिए होती है, यह सारी छूट होती है मालिकों के लिए। सो नियम ऐसे हों जिससे मीडिया कर्मी निर्भय होकर, प्रतिबद्धता के साथ अपना काम कर सकें। केंद्र सरकार अगर चैनलों की भीड़ रोकने और उन्हें नियमों में बांधने के लिए आगे आ रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। ध्यान रहे यह मामला सेंसरशिप का नहीं हैं। पत्रकारों के कल्याण, उनके जीवन से भी जुड़ा है, सो इस मुद्दे पर एलर्जिक होना ठीक नहीं है। ( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

आतंकवादः जरूरी है खबरों की गेटकीपिंग

-संजय द्विवेदी
आतंकवाद का जैसा वैश्विक चेहरा बन रहा है वह बहुत बदरंग है। मीडिया की लाचारी है कि वह इससे सीधे नहीं जूझ सकता। उसका संकट यह है कि यदि वह इसे ठीक तरीके से प्रस्तुत करता है तो उसके महिमामंडन का आरोप उस पर लगता है इसी तरह प्रस्तुत न करने पर सूचना के दबाए जाने का आरोप भी उस पर लग सकता है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी बहुत अलग हो जाती है। हमें यह मानना होगा कि आतंकवाद कोई साधारण अपराध नहीं है। हम उसे अन्य सामान्य अपराधों के समानांतर नहीं देख सकते। मीडिया में इसका कवरेज कहीं न कहीं इन ताकतों के हितसाधन के रूप में ही व्याख्यायित किया जाता है।
वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं। अगर आज इनका एक बड़ा संजाल दुनिया के भीतर खड़ा हुआ है तो यह साधारण नहीं है। ऐसे में भारत जैसे आतंकवाद के एक बड़े शिकार देश में, मीडिया की चुनौती बड़ी कठिन हो जाती है।
भारत जैसे देश में जहां विविध भाषा-भाषी, जातियों, धर्मों के लोग अपनी-अपनी सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं के साथ सांस ले रहे हैं, आतंक को फलने- फूलने के अवसर मिल ही जाते हैं। हमारा उदार लोकतंत्र और वोट के आधार पर बननेवाली सरकारें भी जिस प्रामणिकता के साथ आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, खड़ी नहीं हो पातीं। जाहिर तौर पर ये लापरवाही, आतंकी ताकतों के लिए एक अवसर में बदल जाती है। ऐसे में भारतीय मीडिया की भूमिका पर विचार बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या भारतीय मीडिया अपने आप में एक ऐसी ताकत बन चुका है जिससे आतंकवाद जैसे मुद्दे पर कोई अपेक्षा पाली जानी चाहिए। मुंबई हमलों के वक्त मीडिया कवरेज को लेकर जैसे सवाल उठे वे अपनी जगह सोचने के लिए विवश करते हैं लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि आतंकवाद जैसे गंभीर विषय पर संघर्ष के लिए क्या हमारा राष्ट्र- राज्य तैयार है। भारत जैसा महादेश जहां दुनिया की दूसरी बड़ी आबादी रहती है में ऐसी क्या कमजोरी है कि हम आतंकवादी ताकतों का सबसे कमजोर निशाना हैं। आतंकवाद का बढ़ता संजाल दरअसल एक वैश्विक संदर्भ है जिसे समझा जाना जरूरी है। दुनिया के तमाम देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। बात भारत और उसके पड़ोसी देशों की हो तो यह जानना भी दिलचस्प है कि आतंकवाद की एक बड़ी पैदावार इन्हीं देशों में तैयार हो रही है। भारतीय मीडिया के सामने यह बड़ा सवाल है कि वह आतंकवाद के प्रश्न पर किस तरह की प्रस्तुति करे। आप देखें तो पाकिस्तान हिंदुस्तानी मीडिया का एक प्रिय विषय है वह शायद इसलिए क्योंकि दोनों देशों की राजनीति एक-दूसरे के खिलाफ माहौल बनाकर अपने चेहरों पर लगी कालिख से बचना चाहती है। पाकिस्तान में जिस तरह के हालात लगातार बने हुए हैं उसमें लोकतंत्र की हवा दम तोड़ती नजर आ रही है। जिसके चलते वहां कभी अच्छे हालात बन ही नहीं पाए। भारत धृणा, पाकिस्तानी राजनीति का मूलमंत्र है वहीं कश्मीर का सवाल इस भावना को खाद-पानी देता रहा है। पर बात अब आगे जा चुकी है,बात अब सिर्फ पाक की नहीं है उन अतिवादी संगठनों की भी है जो दुनिया के तमाम देशों में बैठकर एक ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जिसकी अंत नजर नहीं आता। पाक की सरकार भी इनके आगे बेबस नजर आती है। यहां भारतीय संदर्भ में यह रेखांकित करना जरूरी है कि हमारा देश भी लगातार ऐसे खतरों से जूझने के बावजूद कोई ऐसी कारगर विधि विकसित नहीं कर पाया जिससे आतंकवाद के विस्तार या प्रसार को रोक पाने में माकूल कदम कहा जा सके। यह पूरा मामला भारतीय राष्ट्र- राज्य की विफलता के रूप में सामने आता है। ऐसे में आतंकवाद की तरफ देखने के मीडिया के रवैये पर बातचीत करने के बजाए हमें सोचना होगा कि क्या हम आतंकवाद को कोई समस्या वास्तव में मान रहे हैं या हमने इसे अपनी नियती मान लिया है। दूसरा सवाल यह उठता है कि अगर हम इसे समस्या मानते हैं तो क्या इसके ईमानदार हल के लिए सच्चे मन से तैयार हैं। मीडिया के इस प्रभावशाली युग में मीडिया को तमाम उन चीजों का भी जिम्मेदार मान लिया जाता है जिसके लिए वह जिम्मेदार होता नहीं हैं। मीडिया सही अर्थों में घटनाओं के होने के बाद उसकी प्रस्तुति या विश्लेषण की ही भूमिका में नजर आता है। आतंकवाद जैसे प्रश्न के समाधान में मीडिया एक बहुत सामान्य सहयोगी की ही भूमिका निभा सकता है। आज भारत जैसा देश आतंकवाद के अनेक रूपों से टकरा रहा है। एक तरफ पाक पोषित आतंकवाद है तो दूसरी ओर वैश्विक इस्लामी आतंकवाद है जिसे अलकायदा,तालिबान जैसे संगठन पोषित कर रहे हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों में चल रहा आतंकवाद तथा अति वामरूझानों में रूचि रखने वाला नक्सल आतंक जिसने वैचारिक खाल कुछ भी पहन रखी हो, हैं वे भारतीय लोकतंत्र के विरोधी ही। ऐसे समय में जब आतंकवाद का खतरा इतने रूपों में सामने हो तो मीडिया के किसी भी माध्यम में काम करने वाले व्यक्ति की उलझनें बढ़ जाती हैं।
एक तो समस्या की समझ और उसके समाधान की दिशा में सामाजिक दबाव बनाने की चुनौती सामने होती है तो दूसरी ओर मीडिया की लगातार यह चिंता बनी रहती है कहीं वह इन प्रयासों में जरा से विचलन से भारतीय राज्य या लोकतंत्र का विरोधी न मान लिया जाए। घटनाओं के कवरेज के समय उसके अतिरंजित होने के खतरे तो हैं पर साथ ही अपने पाठक और दर्शक से सच बचाने की जिम्मेदारी भी मीडिया की ही है। यह बात भी सही है कि तालिबान और अलकायदा के नाम पर कुछ बेहद फूहड़ प्रस्तुतियां भी मीडिया में देखने को मिलीं जिनकी आलोचना भी हुयी। इतने संवेदनशील प्रश्न पर मीडिया का जरा भी विचलन उसे उपेक्षा और उपहास का पात्र जरूर बनाता है। किंतु यह कहने और स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए हर संकट के समय भारतीय मीडिया ने अपने देश गौरव तथा आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता को प्रकट किया है। मुंबई धमाकों के समय भारतीय मीडिया की भूमिका को काफी लांछित किया गया और उसके सीधे प्रसारण को कुछ लोगों की मौत का जिम्मेदार भी माना गया। किंतु ऐसे प्रसंगों पर सरकार की जबाबदेही सामने आती है। मीडिया अपनी क्षमता के साथ आपके साथ खड़ा है। किस प्रसंग का प्रसारण करना किसका नहीं इसका नियमन मीडिया स्वयं नहीं कर सकता। जब सीधे प्रसारण को रोकने की बात सेना की ओर से कही गयी तो मीडिया ने तत्काल इस पर अमल किया। भारत में इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी शैशव अवस्था में है उसे एक लंबी दूरी तय करके परिपक्वता प्राप्त करनी है। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि आतंकवाद जैसे राष्ट्रीय प्रश्न पर मीडिया की भूमिका पर विचार जरूर हो। उसके कवरेज की सीमाएं जरूर तय हों। खासकर ऐसे मामलों में कि जब सेना या सुरक्षा बल कोई सीधी लड़ाई लड़ रहे हों। मीडिया पर सबसे बड़ा आरोप यही है कि वह अपराध या आतंकवाद के महिमामंडन का लोभ संवरण नहीं कर पाता। यही प्रचार आतंकवादियों के लिए मीडिया आक्सीजन का काम करता है। यह गंभीर चिंता का विषय है। इससे आतंकियों के हौसले तो बुलंद होते ही हैं आम जनता में भय का प्रसार भी होता है। विचारक बौसीओऊनी लिखते हैं कि – वास्तव में संवाददाता पूर्णतया सत्य खबरों का विवरण नहीं देते । परिणामतः वे इस प्रक्रिया में एक विषयगत भागीदार बन जाते हैं। ये मुख्यतया समाचार लेखक ही होते हैं। आतंकवादी इन स्थितियों का पूर्ण लाभ उठा लेते हैं औऱ बड़ी ही दक्षतापूर्वक इन जनमाध्यमों का उपयोग अपने स्वार्थ एवं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर लेते हैं।
जाहिर तौर पर देश जब एक बड़ी लड़ाई से मुखातिब है तो खास संदर्भ में मीडिया को भी अपनी भूमिका पर विचार करना चाहिए। आज असहमति के अधिकार के नाम पर देश के भीतर कई तरह के सशस्त्र संघर्ष खड़े किए जा रहे हैं, लोकतंत्र में भरोसा न करने वाली ताकतें इन्हें कई बार समर्थन भी करती नजर आती हैं। यह भी बड़ा गजब है कि लोकतंत्र में आस्था न रखने वाले, खून-खराबे के दर्शन में भरोसा करने वालों के प्रति भी सहानुभूति रखनेवाले मिल जाते हैं। राज्य या पुलिस अथवा सैन्य बलों के अतिवाद पर तो विचार- जांच करने के लिए संगठन हैं किंतु आतंकवादियों या नक्सलियों के खिलाफ आमजन किसका दरवाजा खटखटाएं। यह सवाल सोचने को विवश करता है। क्रांति या किसी कौम का राज लाना और उसके माध्यम से कोई बदलाव होगा ऐसा सोचने मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा ही है। शासन की तमाम प्रणालियों में लोकतंत्र ही अपनी तमाम बुराइयों के बावजूद सबसे श्रेष्ठ प्रणाली मानी गयी है। ऐसे में मीडिया को यहां सावधान रहने की जरूरत है कि ये ताकतें कहीं उसका इस्तेमाल न कर ले जाएं। सूचना देने के अपने अधिकार के साथ ही साथ हमारी एक बड़ी जिम्मेदारी अपने देश के प्रति भी है। अतएव किसी भी रूप में आतंकवादी हमारी ताकत से प्रचार या मीडिया आक्सीजन न पा सकें यह देखना जरूरी है। विद्वान विलियम कैटन लिखते हैं कि – आतंकवाद बुनियादी रूप से एक रंगमंच की तरह होता है। आतंकवादी गतिविधियों के द्वारा यह समूह जनता में अपनी भूमिकाएं अभिनीत करता है एवं जनमाध्यमों एवं मीडिया द्वारा इसे लोंगों तक सुगमता से पहुंचाता है। हालांकि जनमाध्यमों के बिना भी वह अपना आतंक आम आदमी तक बना ही लेता है।
ऐसे में मीडिया की ताकत का सावधानीपूर्वक उपयोग जरूरी हो जाता। हिंदुस्तानी मीडिया आपातकाल की काली यादों के चलते किसी तरह की सरकारी आचार संहिता को लेकर बेहद एलर्जिक है, ऐसे में मीडिया को अपनी राह खुद बनानी होगी ताकि उसका दुरूपयोग न किया जा सके। इसके लिए मीडिया समूह अपनी तरफ से आचार संहिता बना सकते हैं। कुछ समूह और संगठन ऐसी पहल करते हैं किंतु व्यवहार में देखा गया है कि वे इसका पालन करने में विफल रहे जाते हैं। ऐसे में मीडिया को खबरों की गेटकीपिंग पर खास जोर देना चाहिए ताकि इसका दुरूपयोग रोका जा सके। दूसरा बड़ा काम जनमत निर्माण का है, अपने लेखन और प्रस्तुति से कहीं भी मीडिया को आतंकवाद के प्रति नरम रवैया नहीं अपनाना चाहिए ताकि जनता में आतंकी गतिविधियों के प्रति समर्थन का भाव न आने पाए। आतंकवाद के खिलाफ मुंबई हमलों के बाद मीडिया ने जिस तरह की बहस की शुरूआत की उसे साधारण नहीं कहा जा सकता। उसकी प्रशंसा होनी चाहिए। हमारी आतंरिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न जिस तरह से उठाए गए वे शायद पहली बार इतनी प्रखरता से सामने आए। हमें देखना होगा कि आतंकवाद का सवाल टीआरपी के दीवानों के उपयोग का विषय नहीं है। ऐसे सवालों पर भी अगर हम टीआरपी तलाश रहे हैं तो इस देश का भगवान ही मालिक है। हमें देखना है कि हमारी कोई भी गतिविधि इस राज्य के तंत्र को कमजोर करने वाली साबित न हो। राजनीतिक नेतृत्व की विफलता को रेखांकित करने के अलावा हमारे गुप्तचर तंत्र और उससे जुड़ी तमाम खामियों पर एक सार्थक विमर्श सामने आया। आज के दौर में जिस तरह से मीडिया एक प्रभावशाली भूमिका में सामने आया है मीडिया से उम्मीदें बहुत बढ़ गयीं हैं। शायद इसीलिए मीडिया की आलोचना बहुत हो रही है क्योंकि सभी तंत्रों से निराश लोगों की उम्मीदें आखिर में मीडिया पर टिकी हैं। इन उम्मीदों को पूरा करना और उस पर खरा उतरना मीडिया की जिम्मेदारी है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि आतंकवाद की खबर अन्य खबरों की तरह एक सामान्य खबर है यह सोच भी बदलनी चाहिए। इससे आतंकवाद के प्रति मीडिया के खास रवैये का प्रगटीकरण भी होगा और मीडिया में उत्तरदायित्वपूर्ण भावना का विकास होगा।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
मोबाइलः 098935-98888 ईमेल - 123dwivedi@gmail.com
वेबसाइटः www.sanjaydwivedi.com
ब्लागः http://www.sanjayubach.blogspot.com/

शाहरूख और ठाकरेः जोड़ी क्या बनाई

-संजय द्विवेदी
बाल ठाकरे, शाहरूख एक साथ दोनों हो तो टीवी चैनलों के न्यूज रूम की रंगत ही बदल जाती है। एक बार बालीबुड की एक अभिनेत्री ने कहा था यहां तो दो ही चीजें बिकती हैं एक सेक्स, दूसरा शाहरूख। लेकिन मीडिया की मंडी में ठाकरे भी बिकता है। बाल हों या राज दोनो चलेगें। इस हफ्ते तो टीवी न्यूज चैनलों का मौजा ही मौजा हो गया। ठाकरे और शाहरूख दोनों को एक साथ पाकर खबरिया चैनल तो धन्य-धन्य हो रहे थे। वाह-वाह रामजी जोड़ी क्या बनाई। सुबह से शाम बस बिकने वाला मसाला। यहां क्या नहीं था। थ्रिल, सस्पेंस और ड्रामा सब मौजूद था। बाकी के लिए शाहरूख की फिल्मों की क्लीपिंग्स और ठाकरे के लिए सरकारराज जैसी फिल्मों के कतरे। सारे एंकर उत्साह में। कुछ भी पूछो, किसी से भी पूछो। इस फिल्मी तमाशे में सब शामिल थे। क्या हीरो-हीरोइन, क्या नेता, क्या जनता, क्या पुलिस। ऐसे अनोखे संयोग घटित कहां होते हैं। टीआरपी की चिंता नहीं थी। विषय की चिंता भी नहीं थी, बस हमें खींचे जाना है।
कोई ठाकरे को थप्पड़ दे रहा था तो कोई उन्हें फ्लाप बता रहा था। सच तो यह है कि मीडिया किसी का नहीं है। कल तक ठाकरे को मुंबई का शेर बताने वाला मीडिया आज उन्हें चूहा साबित करने पर जुटा था। सरकार हैं भी ऐसे, कहां परवाह करते हैं कि कौन क्या कहता है। वे तो जिन्ना साहिब की तरह की डायरेक्ट एक्शन के पक्ष में रहते हैं। डरे लोगों को डराकर अपना सरकारराज चलाते आए ठाकरे साहब को शाहरूख ने थोड़ी हिम्मत क्या दिखाई मीडिया उनके पीछे ही पड़ गया। शाहरूख विदेश में पर देश में कैमरा तो उन्हें ही फालो कर रहा था। ठाकरे और शाहरूख दोनों को ही मजा आ रहा था इस खेल में। उन्हें आमने-सामने आने की क्या जरूरत। मीडिया है न इसके लिए। ऐसा लाइव तमाशा मुंबई ने ताज हमले के बाद ही देखा है। मीडिया इसीलिए ठाकरे परिवार की लंबी आयु की दुआ करता है। वो तो भला हो कि बाला साहब थोड़ा बीमार हैं , इसलिए मीडिया ने राज ठाकरे को नेता बनाया। कल्पना करें अगर टीवी चैनल न होते राज ठाकरे नाम की बीमारी का नाम देशवासी कितने सालों में जान पाते। लेकिन यहां तो सब कुछ तैयार, इंस्टेंट फूड की तरह। राज ठाकरे को मीडिया ने महानायक बना दिया।
मीडिया को लाइव तमाशे भाते हैं। दृश्य माध्यम होने के नाते यह उनकी मजबूरी भी है। उन्हें कुछ ड्रामा और तमाशा चाहिए तभी तो दर्शक बंधकर बैठेगा। टीआरपी भूत तभी पकड़ में आएगा। टीआरपी ऐसी ही आती है। वह बाबा रामदेव से आती है, राखी सावंत से आती है, राजू श्रीवास्तव से आती है और ठाकरे से आती है। इस मंत्र को ठाकरे परिवार ने पकड़ लिया है। वे जानते हैं कि राहुल भैया की तरह गांव की धूल फांकने से क्या होगा, आडवानी की तरह रथयात्राएं करने से क्या होगा, शिवराज सिंह चौहान की तरह यात्राओं से क्या होगा। मातोश्री में बैठो, मनसे के दफ्तर में बैठो अपने गुर्गों को हुकुम दो जाओ दो टैक्सियां तोड़ दो। वे दो टैक्सियां की तोड़फोड़ दिखाकर हम मीडिया वाले आपको महानायक बना देंगें। देखिए और जानिए कि मराठी अस्मिता के लिए किस तरह हम तोड़फोड़ कर रहे हैं। फिर चर्चा, विमर्श के लिए शाम को देश के सारे महा एंकर मैदान में उतर पड़ेंगें। मजा नहीं आ रहा तो शाहरूख, सचिन या अमिताभ के खिलाफ अपने भोंपू पेपर में लिख देते हैं। पेपर पढ़कर भी टीवी न्यूज चैनल वाले खबर बना लेते हैं। काय को टेंशन लेने का। सब बताएंगें कि बाला साहब ने क्या लिखा। सामना पेपर को खरीदने की जरूरत नहीं, मुंबईवासियों पूरा पेपर टीवी वाले पढ़कर बताएंगें। दो रूपए कायकू खर्च करने का, बड़ा पाव खाने का और टीवी देखने का। टीवी वाला सब बताता है,कल मुंबई में क्या होने का। टीवी चैनल के रहते फिकर काहे की। बाल ठाकरे साहब क्या सोचने वाला है यह भी एंकर बताता है। बाकी समझ नहीं आए तो ग्राफिक्स से बताते हैं।
शाहरुख भाई भी समझदार निकले, खुद तो फिल्म के प्रोमोशन के लिए विदेश चले गए। देश में फिल्म का ठेका ठाकरे भाई को दे गए अंकल, फिल्म हिट करा दो। सो बालासाहब लग गए बोले फिल्म से कोई विरोध नहीं, सारा झगड़ा शाहरूख से है। फिल्म नहीं चलेगी। बाल ठाकरे सहित पूरी महाराष्ट्र सरकार फिल्म के प्रोमोशन में लग गयी। देखा भाई कितना सयाणा है अपना किंग खान। पूरी मुंबई को बेवकूफ बनाकर अपना पिक्चर बेच दिया। मीडिया वाले भाई भी सहप्रयोजक हो गए। मीडिया को लगता है वह शाहरूख को इस्तेमाल कर रहा है, हमें लगता है कि भाई कोई घाटे में नहीं सबने सबको इस्तेमाल किया। ठाकरे, शाहरूख और मीडिया तीनों को एक दूसरे का शुक्रगुजार होना चाहिए। क्योंकि ये हैं ही एक-दूजे के लिए। हमारी दुआ है कि वेलेटाइन डे की वेला पर इनका प्यार और बढ़े धंधा व रोजगार बढ़े। इसी में सबकी रोजी रोटी चलती रहेगी। बोलिए टीआरपी महारानी की जय।

Friday, March 12, 2010

मीडिया के विस्तार में सहायक बनी नई प्रौद्योगिकी


- संजय द्विवेदी


बात अगर नई तकनीक और प्रौद्योगिकी की करें तो उसने अखबारों की ताकत और उर्जा का विस्तार ही किया है। अखबारों का नया रूप ज्यादा स्वीकार्य, सुदर्शन और व्यापक हुआ है तो इसके पीछे इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी का विकास ही है। सूचना की दुनिया की बढ़ती गति ने अखबारों के कार्यालयों का स्वरूप बदल गया। खबरें ज्यादा तेजी से, ज्यादा सज-धज के सामने आने लगीं। कम्प्यूटर पर पेजमेकिंग के नित नए साफ्टवेयर्स ने अखबारों को बेहद सजीला बना दिया है। आंचलिक अखबारों की बढ़ी ताकत और उनके नित नए संस्करणों का विकास दरअसल सूचना प्रौद्योगिकी और प्रिटिंग टेक्नालाजी में आए बदलावों के चलते ही संभव हुआ है। इसी आईटी क्रांति ने भाषाई पत्रकारिता को नवजीवन और नया जोश दिया है। यह दरअसल भारत जैसे देश के लिए एक नई परिघटना है। तेजी से बढ़ती साक्षरता, लोगों की बढ़ती क्रयशक्ति और स्टेटस सिंबल के रूप में बदलते अखबार एक ऐसी घटना है जिसे समझना जरूरी है। शायद यही कारण है कि भारत प्रिंट मीडिया के सबसे बड़े विश्वबाजार के रूप में उभर रहा है।
ये विकास का पहला चरण है, विकास का यह दौर अभी शुरू हुआ है जाहिर तौर पर वह लंबा खिचेंगा। विद्वानों की मानें तो भारतीय प्रिंट मीडिया को अभी दस या पंद्रह सालों तक कोई गंभीर चुनौती बेब माध्यम प्रस्तुत कर पाएंगें ऐसा नहीं लगता। लेकिन क्या दूसरे चरण में भी अखबारों की यह विकासयात्रा जारी रह पाएगी यह सवाल सबके सामने है। दस या पंद्रह साल बाद ही सही अखबारों के सामने चुनौती के रूप में वेब माध्यम का विकास तो हो ही रहा है। वह कुछ प्रतिशत में ही सही, अखबार को सूचना का प्राथमिक श्रोत तो नहीं ही रहने देगा। आज यह आंकड़ा बहुत कम जरूर है किंतु यह तेजी से बढ़नेवाला है इसे मान लेना चाहिए। हम इसे आज की युवा पीढ़ी जो शहरों में रह रही है कि बदलती आदतों से समझ सकते हैं कि वह किस माध्यम के ज्यादा करीब है। इंटरनेट के अविष्कार ने इसे एक ऐसी शक्ति दी जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। वेबसाइट्स के निर्माण से ई-रीडिंग का प्रचलन भी बढ़ा है । हमारे पुस्तकालय खाली पड़े होंगे किंतु साइबर कैफै युवाओं से भरे-पड़े हैं। एक क्लिक से उन्हें दुनिया जहान की तमाम जानकारियां और साहित्य का खजाना मिल जाता है। यह सही है उनमें चैटिंग और पोर्न साइट्स देखनेवालों की भी एक बड़ी संख्या है किंतु यह मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि नई पीढ़ी आज भी ज्यादातर सूचना या पाठ्य सामग्री की तलाश में इन साइट्स पर विचरण करती है। तकनीक कभी भी किसी विधा की दुश्मन नहीं होती, वह उसके प्रयोगकर्ता पर निर्भर है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करता है। नई तकनीक ने सूचनाओं का कवरेज एरिया तो बढ़ा ही दिया ही साथ ही ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों के प्रति युवाओं की पहुंच का विस्तार भी किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। यह सारा कुछ हमारे पढने के समय की ही चोरी है। परंपरागत तरीके के अध्ययन से यह तरीका अलग है। अखबार तो नेट और मोबाइल पर पढ़े जा सकते हैं, आपके टीवी सेट पर भी देखे जा सकते हैं।
अखबारों की पठनीयता पर कोई गंभीर अध्ययन कराया जाए तो इसके सही निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। अखबार शहरी क्षेत्रों में पढ़े नहीं, पलटे जा रहे हैं। फिर इनके प्रसार बढ़ने का कारण क्या है। सही मानें तो अखबार एक स्टेटस सिंबल में बदल गए हैं। पढ़ने के मातृभाषा का अखबार और डायनिंग हाल में रखने को अंग्रेजी का अखबार। चार लोगों के रहने वाले घर में भी दो या चार अखबार आसानी से आते हैं। बढ़ती क्रय शक्ति भी इसका उत्प्रेरक तत्व बनी है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती साक्षरता प्रेरक तत्व बनी है। सूचना पाने की उत्कंठा आज समाज के हर वर्ग में हैं। कंप्यूटर साक्षरता की धीमी गति, बिजली की कम उपल्ब्धता, मंहगे कंप्यूटर धीमी इंटरनेट कनेक्टिविटी ने अखबारों के लिए जीवनदान का काम किया है। आपको टीवी देखते, इंटरनेट पर विचरण करते युवाओं की टोली मिल जाएगी पर अखबार को धर्मग्रंथ की तरह बांचते अब प्रौढ़ या वृद्ध ही दिखते हैं।
इस तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के नाते उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस मामले में इंटरनेट अभी ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्च भी कम है और ब्लाग तो निःशुल्क ही हैं। सो एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति को सुलभ मानता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहां सीधा औऱ सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक है इसके चलते वेबमाध्यम अभी उतने प्रभावी नहीं दिखते, पर यह तकनीक सही मायने निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तेमाल ने एक अनजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपना ब्लाग मुफ्त में ही बनाकर अपनी रचनाशीलता से दूर बैठे अपने दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। भारत जैसे देश में जहां साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के इंतजाम से जीवित रह सकता है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि इस पत्रिका का टिका रहना, विपणन रणनीति पर नहीं, उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। वेबसाइट्स पर चलने वाली पत्रिकाएं और सूचनाप्रधान अखबार अपनी गुणवत्ता से जीवित रहते हैं जबकि प्रिंट पर छपने वाली पत्रिकाएं और अखबार अपनी विपणन रणनीति और अर्थ प्रबंधन की कुशलता से ही दीर्धजीवी हो पाते हैं। सो साहित्य के अनुरागी जनों के लिए ब्लाग जहां एक मुफ्त की जगह उपलब्ध कराता है वहीं इस माध्यम पर नियमित पत्रिका या विचार के फोरम मुफ्त चलाए जा सकते हैं। इसमें गति भी है और गुणवत्ता भी। इस तरह बाजार की संस्कृति का विस्तारक होने की आरोपी होने के बावजूद आप इस माध्यम पर बाजार के खिलाफ, उसकी अपसंस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। इस मायने में यह बेहद लोकतांत्रिक माध्यम भी है। इसने पत्राचार की संस्कृति को ई-मेल के जरिए लगभग खत्म तो कर दिया है पर गति बढ़ा दी है, इसे सस्ता भी कर दिया है।
सही मायने में अभी हिंदी समाज को ई-संस्कृति विकसित होने का इंतजार करना पड़ेगा। इसके चलते भले ही प्रिंट माध्यम अपनी उपयोगिता बनाए रख सकते हैं। बावजूद हिंदी का यह बन रहा विश्व समाज हमें नए मीडिया के द्वारा खोले गए अवसरों के उपयोग करने वाली पीढ़ी तैयार कर रहा है। हिंदी का श्रेष्ठ साहित्य न्यू मीडिया में अपनी जगह बना सके इसके प्रयास हो रहे हैं। इंटरनेट ने प्रायः उन विधाओं और विषयों को फोकस किया है जो प्रायः मुख्यधारा के मीडिया से गायब हो रहे हैं। प्रिंट में अनुपस्थित बहुत सी विधाओं और विषयों पर इंटरनेट पर गंभीर विमर्श देखे जा रहे हैं। सो यह माध्यम देर-सबेर एक चुनौती के रूप में सामने तो खड़ा है ही। भारत के प्रायः सभी अखबार आज अपनी वेबसाइट बना चुके हैं इसका मतलब यह है कि उन्होंने इस माध्यम की स्वीकार्यता को समझ लिया है। इसके साथ ही कई अखबार मोबाइल पर भी खबरें दे रहे हैं। सो प्रिंट माध्यम के धराने एक साथ रेडियो, टीवी, फिल्म, मोबाइल न्यूज,वेबमाध्यम सभी में प्रवेश कर रहे हैं। इससे एक माध्यम दूसरे माध्यम को चुनौती भी देता हुआ दिखता है तो सहयोगी की भूमिका में भी है। इसे प्रिंट माध्यमों से जुड़े घरानों का विस्तारवाद तो कहा ही जा सकता है पर इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि इन घरानों ने प्रिंट माध्यम या अखबारों की सीमाएं समझ ली हैं। आने वाला समय सूचना के विविध माध्यमों में आपसी संघर्ष के गवाह बनेगा जिसे देखना निश्चय ही रोचक होगा।