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Sunday, October 10, 2010

वाड्.मय पुरस्कार से नवाजे गए संजय



मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने किया सम्मान
भोपाल,10 अक्टूबर। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने रविवार को भोपाल स्थित हिंदी भवन के सभागार में आयोजित समारोह में युवा पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी को उनकी नई किताब ‘मीडियाः नया दौर- नई चुनौतियां’ के लिए इस वर्ष के वाड्.मय पुरस्कार से सम्मानित किया। स्व. हजारीलाल जैन की स्मृति में प्रतिवर्ष किसी गैर साहित्यिक विधा पर लिखी गयी किताब पर यह पुरस्कार दिया जाता है।
मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा आयोजित इस सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री बाबूलाल गौर ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में सांसद रधुनंदन शर्मा मौजूद थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत भाषण समिति के अध्यक्ष रमेश दवे ने किया और आभार प्रदर्शन कैलाश चंद्र पंत ने किया। संजय की यह किताब यश पब्लिकेशन, दिल्ली ने छापी है और इसमें मीडिया के विविध संदर्भों पर लिखे उनके लेख संकलित हैं। सम्मान समारोह में वितरित पुस्तिका में कहा गया है कि- “वर्ष 2010 में प्रकाशित इस कृति में लेखक के आत्मकथ्य सहित 27 लेख हैं। इन लेखों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की दशा व दिशा का आज के बाजारवाद के परिप्रेक्ष्य में विशद् तार्किक विवेचन किया गया है। पुस्तक के लेखक संजय द्विवेदी स्वयं पत्रकारिता को जी रहे हैं, इसलिए पुस्तक के लेखों में विषय की गहराई, सूक्ष्मता और अनुभवपरकता तीनों मौजूद है। पुस्तक मीडिया से जुड़े कई अनदेखे पृष्ठ खोलने में सफल है।” श्री द्विवेदी अनेक प्रमुख समाचार पत्रों के अलावा इलेक्ट्रानिक और वेबमीडिया में भी महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। उनकी अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और छः पुरस्कार भी मिल चुके हैं। संप्रति वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।

पुस्तक परिचयः
पुस्तक का नामः मीडियाः नया दौर नई चुनौतियां
लेखकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र

Friday, September 17, 2010

संजय द्विवेदी की मीडिया केंद्रित पुस्तक का लोकार्पण 22 को


भोपाल। पत्रकार एवं मीडिया विश्वेषक संजय द्विवेदी की पुस्तक “मीडियाः नया दौर, नई चुनौतियां” का लोकार्पण समारोह 22 सितंबर, 2010 को अपराह्न 3.30 बजे भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सभागृह में आयोजित किया गया है।
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद प्रभात झा होंगें तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला करेंगें। आयोजन में इंडिया टीवी के कार्यकारी संपादक रविकांत मित्तल, विशिष्ट अतिथि होंगें। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी की यह किताब यश पब्लिकेशन दिल्ली ने प्रकाशित की है, जिसमें आज के मीडिया पर खास विमर्श है।
पुस्तक परिचयः
पुस्तक का नामः मीडियाः नया दौर नई चुनौतियां
लेखकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र

Friday, June 18, 2010

मिक्स मसाला खबरों का दौर


मनोरंजन प्रधान खबरों ने बदल दिया है समाचार चैनलों का चरित्र
भरोसा नहीं होता कि खबरें इतनी बदल जाएंगीं। समाचार चैनलों पर खबरों को देखना अब मिक्स मसाले जैसे मामला है। खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ सूचनाएं नहीं देती, वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर का ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल, यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं, कुछ सतरंगी भी। आज यह कहना मुश्किल है कि आप समाचार चैनल देख रहे हैं या कोई मनोरंजन चैनल। कथ्य और प्रस्तुति के मोर्चे पर दोनों में बहुत अंतर नहीं दिखता।
मनोरंजन चैनल्स पर चल रहे कार्यक्रमों के आधार पर समाचार चैनल अपने कई घंटे समर्पित कर रहे हैं। उन पर चल रहे रियालिटी शो, नृत्य संगीत और हास्य-व्यंग्य के तमाम कार्यक्रमों की पुनःप्रस्तुति को देखना बहुत रोचक है।समाचारों की प्रस्तुति ज्यादा नाटकीय और मनोरंजक बनाने पर जोर है। ऐसे में उस सूचना का क्या हो जिसके इंतजार में दर्शक न्यूज चैनल पर आता है।
खबरों का खबर होना सूचना का उत्कर्ष है, लेकिन जब होड़ इस कदर हो तो खबरें सहम जाती हैं, सकुचा जाती हैं और खड़ी हो जाती हैं किनारे। खबर का प्रस्तोता स्क्रीन पर आता है और वह बताता है कि यह खबर आप किस नज़र से देखेंगे। पहले खबरें दर्शक को मौका देती थीं कि वह समाचार के बारे में अपना नज़रिया बनाए। अब नज़रिया बनाने के लिए खबर खुद बाध्य करती है। आपको किस ख़बर को किस नज़रिए से देखना है, यह बताने के लिए छोटे पर्दें पर तमाम सुंदर चेहरे हैं जो आपको अपनी खबर के साथ बहा ले जाते हैं। ख़बर क्राइम की है तो कुछ खतरनाक शक्ल के लोग, खबर सिनेमा की है तो कुछ सुदर्शन चेहरे, ख़बर गंभीर है तो कुछ गंभीरता का लबादा ओढ़े चेहरे ! कुल मिलाकर मामला अब सिर्फ ख़बर तक नहीं है। ख़बर तो कहीं दूर बहुत दूर, खडी है...ठिठकी हुई सी। उसका प्रस्तोता बताता है कि आप ख़बर को इस नज़र देखिए। वह यह भी बताता है कि इस ख़बर का असर क्या है और इस खबर को देख कर आप किस तरह और क्यों धन्य हो रहे हैं ! वह यह भी जोड़ता है कि यह ख़बर आप पहली बार किसी चैनल पर देख रहे हैं। दर्शक को कमतर और ख़बर को बेहतर बताने की यह होड़ अब एक ऐसी स्पर्धा में तब्दील हो गई है जहाँ ख़बर अपना असली व्यक्तित्व को खो देती है और वह बदल जाती है नारे में, चीख में, हल्लाबोल में या एक ऐसे मायावी संसार में जहाँ से कोई मतलब निकाल पाना ज्ञानियों के ही बस की बात है।
हर ख़बर कैसे ब्रेकिंग या एक्सक्लूसिव हो सकती है, यह सोचना ही रोचक है। टीवी ने खबर के शिल्प को ही नहीं बदला है। वह बहुत कुछ फिल्मों के करीब जा रही है, जिसमें नायक हैं, नायिकाएं हैं और खलनायक भी। साथ मे है कोई जादुई निदेशक । ख़बर का यह शिल्प दरअसल खबरिया चैनलों की विवशता भी है। चौबीस घंटे के हाहाकार को किसी मौलिक और गंभीर प्रस्तुति में बदलने के अपने खतरे हैं, जो कुछ चैनल उठा भी रहे हैं। पर अपराध, सेक्स, मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसर्गिक विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला कहीं न कहीं टीआरपी से ही जाकर जुड़ता है। इतने प्रभावकारी माध्यम और उसके नीति नियामकों की यह मजबूरी और आत्मविश्वासहीनता समझी जा सकती है। बाजार में टिके रहने के अपने मूल्य हैं। ये समझौतों के रूप में मीडिया के समर्पण का शिलालेख बनाते हैं। शायद इसीलिए जनता का एजेंडा उस तरह चैनलों पर नहीं दिखता, जिस परिमाण में इसे दिखना चाहिए । समस्याओं से जूझता समाज, जनांदोलनों से जुड़ी गतिविधियाँ, आम आदमी के जीवन संघर्ष, उसकी विद्रूपताएं हमारे मीडिया पर उस तरह प्रस्तुत नहीं की जाती कि उनसे बदलाव की किसी सोच को बल मिले। पर्दें पर दिखती हैं रंगीनियाँ, अपराध का अतिरंजित रूप, राजनीति का विमर्श और सिनेमा का हाहाकारी प्रभाव । क्या खबरें इतनी ही हैं ? बाडी और प्लेजर की पत्रकारिता हमारे सिर चढ़कर नाच रही है। शायद इसीलिए मीडिया से जीवन का विमर्श, उसकी चिंताएं और बेहतर समाज बनाने की तड़प की जगह सिकुड़ती जा रही है। कुछ अच्छी खबरें जब चैनलों पर साया होती हैं तो उन्हें देखते रहना एक अलग तरह का आनंद देता है। एनडीटीवी ने ‘मेघा रे मेघा’ नाम से बारिश को लेकर अनेक क्षेत्रों से अपने नामवर रिपोर्टरों से जो खबरें करवाईं थीं वे अद्भूत थीं। उनमें भाषा, स्थान, माटी की महक, फोटोग्राफर, रिपोर्टर और संपादक का अपना सौंदर्यबोध भी झलकता है। प्रकृति के इन दृश्यों को इस तरह से कैद करना और उन्हें बारिश के साथ जोड़ना तथा इन खबरों का टीवी पर चलना एक ऐसा अनुभव है जो हमें हमारी धरती के सरोकारों से जोड़ता है। इस खबर के साथ न ब्रेकिंग का दावा था न एक्सक्लूसिव का लेकिन ख़बर देखी गई और महसूस भी की गई। कोकीन लेती युवापीढ़ी, राखी और मीका का चुंबन प्रसंग, करीना या सैफ अली खान की प्रेम कहानियों से आगे जिंदगी के ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जो इंतजार कर रहे हैं कि उनसे पास भी कोई रिपोर्टर आएगा और जहान को उनकी भी कहानी सुनाएगा । सलमाल और कैटरीना की शादी को लेकर काफी चिंतित रहा मीडिया शायद उन इलाकों और लोगों पर भी नज़र डालेगा जो सालों-साल से मतपेटियों मे वोट डालते आ रहे हैं, इस इंतजार में कि इन पतपेटियों से कोई देवदूत निकलेगा जो उनके सारे कष्ट हर लेगा ! लेकिन उनके भ्रम अब टूट चुके हैं। पथराई आँखों से वे किसी ख़बरनवीस की आँखें तकती है कि कोई आए और उनके दर्द को लिखे या आवाज़ दे। कहानियों में कहानियों की तलाश करते बहुत से पत्रकार और रिपोर्टर उन तक पहुँचने की कोशिश भी करते रहे हैं। यह धारा लुप्त तो नहीं हुई है लेकिन मंद जरूर पड़ रही है। बाजार की मार, माँग और प्रहार इतने गहरे हैं कि हमारे सामने दिखती हुई ख़बरों ने हमसे मुँह मोड़ लिया है। हम तलाश में हैं ऐसी स्टोरी की जो हमें रातों-रात नायक बना दे, मीडिया में हमारी टीआरपी सबसे ऊपर हो, हर जगह हमारे अखबार/चैनल की ही चर्चा हो। इस बदले हुए बुनियादी उसूल ने खबरों को देखने का हमारा नज़रिया बदल-सा दिया है। हम खबरें क्रिएट करने की होड़ में हैं क्योंकि क्रिएट की गई ख़बर एक्सक्लूसिव तो होंगी ही। एक्सक्लूसिव की यह तलाश कहाँ जाकर रूकेगी, कहा नहीं जा सकता। खबरें भी हमारा मनोरंजन करें, यह एक नया सच हमारे सामने है। खबरें मनोरंजन का माध्यम बनीं, तभी तो बबली और बंटी एनडीटीवी पर खबर पढ़ते नजर आए। टीआरपी के भूत ने दरअसल हमारे आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है। इसलिए हमारे चैनलों के नायक हैं- राखी सावंत, बाबा रामदेव और राजू श्रीवास्तव। समाचार चैनल ऐसे ही नायक तलाश रहे हैं और गढ़ रहे हैं। कैटवाक करते कपड़े गिरे हों, या कैमरों में दर्ज चुंबन क्रियाएं, ये कलंक पब्लिसिटी के काम आते हैं । लांछन अब इस दौर में उपलब्धियों में बदल रहे हैं । ‘भोगो और मुक्त हो,’ यही इस युग का सत्य है। कैसे सुंदर दिखें और कैसे ‘मर्द’ की आंख का आकर्षण बनें यही टीवी न्यूज चैनलों का मूल विमर्श है । जीवन शैली अब ‘लाइफ स्टाइल’ में बदल गयी है । बाजारवाद के मुख्य हथियार ‘विज्ञापन’ अब नए-नए रूप धरकर हमें लुभा रहे हैं । नग्नता ही स्त्री स्वातंत्र्य का पर्याय बन गयी है। मेगा माल्स, ऊँची ऊँची इमारतें, डियाइनर कपड़ों के विशाल शोरूम, रातभर चलने वाली मादक पार्टियां और बल्लियों उछलता नशीला उत्साह । इस पूरे परिदृश्य को अपने नए सौंदर्यबोध से परोसता, उगलते न्यूज चैनल एक ऐसी दुनिया रच रहे है जहाँ बज रहा है सिर्फ देहराग, देहराग और देहराग।अब तो यह कहा जाने लगा है खबर देखनी है तो डीडी न्यूज पर जाओ, कुछ डिबेट देखनी है तो लोकसभा चैनल लगा लो। हिंदी के समाचार चैनलों ने यह मान लिया है हिंदी में मनोरंजन बिकता है। अंधविश्वास बिकता है। बकवास बिकती है। राखी, राजू, सुनील पाल बिकते हैं। हालांकि इसके लिए किसी समाचार समूह ने कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया है। किंतु यह आत्मविश्वासहीनता न्यूज चैनलों और मनोरंजन चैनलों के अंतर को कम करने का काम जरूर कर रही है। विचार के क्षेत्र में नए प्रयोगों के बजाए चैनल चमत्कारों,हाहाकारों, ठहाकों, विलापों की तलाश में हैं। जिनसे वे आम दर्शक की भावनाओं से खेल सकें। यह क्रम जारी है, जारी भी रहेगा। जब तक आप रिमोट का सही इस्तेमाल नहीं सीख जाते, तब तक चौंकिए मत क्योंकि आप न्यूज चैनल ही देख रहे हैं।

Saturday, March 13, 2010

ताकि बेमौत न मारे जाएं मीडियाकर्मी


इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाना जरूरी
- संजय द्विवेदी
मीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं।
अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है। जिसमें मीडिया की प्रामणिकता, विश्वसनीयता की चिंताएं तो हैं ही साथ ही उन पत्रकारों का जीवन भी एक अहम मुद्दा है जो अपना कैरियर इन नए-नवेले चैनलों के लिए दांव पर लगा देते हैं। चैनलों की बाढ़ ने न सिर्फ उनकी साख गिरायी है वरन मीडिया के क्षेत्र को एक अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की यह चिंता बहुत स्वाभाविक है कि कैसे इस क्षेत्र में मचे धमाल को रोका जाए। दिसंबर,2008 तक देश में कुल 417 चैनल थे जिसमें 197 न्यूज चैनल काम कर रहे थे। सितंबर,2009 तक सरकार 498 चैनलों के लिए अनुमति दे चुकी है और 150 चैनलों के नए आवेदन विचाराधीन हैं। टीवी मीडिया के क्षेत्र में जाहिर तौर पर यह एक बड़ी छलांग है। कितु क्या इस देश को इतने सेटलाइट चैनलों की जरूरत है। क्या ये सिर्फ धाक बनाने और निहित स्वार्थों के चलते खड़ी हो रही भीड़ नहीं है। जिसका पत्रकार नाम के प्राणी के जीवन और पत्रकारिता के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस दौर में दिल्ली जैसी जगह में हजारों पत्रकार अकारण बेरोजगार बना दिए गए हों और तमाम चैनलों में लोग अपनी तनख्वाह का इंतजार कर रहे हों इस अराजकता पर रोक लगनी ही चाहिए।
यह बहुत बेहतर है कि सरकार इस दिशा में कुछ नियमन करने के लिए सोच रही है। चैनल अनुमति नीति में बदलाव बहुत जरूरी हैं। यह सामयिक है कि सरकार अपने अनुमति देने के नियमों की समीक्षा करे और कड़े नियम बनाए जिसमें कर्मचारी का हित प्रधान हो। ताकि लूट-खसोट के इरादे से आ रहे चैनलों को हतोत्साहित किया जा सके। सरकार ने ट्राइ को लिखा है कि वह उसे इसके लिए सुझाव दे कि और कितने चैनलों की गुंजाइश इस देश में है और चैनलों की बढ़ती संख्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। अपने पत्र में मंत्रालय की चिंता वास्तव में देश की भी चिंता है। पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि नए चैनल शुरू करने वालों में बिल्डर,ठेकेदार, शिक्षा क्षेत्र में व्यापार करने वाले, स्टील व्यापारी समेत तमाम ऐसे लोग हैं जिनका मीडिया उद्योग से कोई लेना देना या पूर्व अनुभव नहीं है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह भी शिकायत मिली है चैनल शुरू करवाने को लेकर दलाली का एक पूरा कारोबार जोर पकड़ चुका है। उल्लेखनीय है कि चैनल शुरू करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय की अनुमति भी लेनी होती है।
हालांकि कुछ आलोचक यह कह कर इन कदमों की आलोचना कर सकते हैं कि यह कदम लोकतंत्र विरोधी होगा कि नए चैनल आने में अड़चनें लगाई जाएं। किंतु जिस तरह के हालात हैं और पत्रकारों व कर्मियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा रहा है उसमें नियमन जरूरी है। चैनल का लाइसेंस पाकर कभी भी चैनल पर ताला डालने का प्रवृत्ति से आम पत्रकारों को गहरा झटका लगता है। उनके परिवार सड़क पर आ जाते हैं। नौकरियों को लेकर कोई सुरक्षा न होना और पत्रकारों से अपने संपर्कों के आधार पर पैसै या व्यावसायिक मदद लेने की प्रवृत्ति भी उफान पर है। चैनल खोलने के शौकीनों से सरकार को यह जानने का हक है कि आखिर वे ऐसा क्या प्रमाण दे रहे हैं कि जिसके आधार पर यह माना जा सके कि आपके पास तीन या पांच साल तक चैनल चलाने की पूंजी मौजूद है। वित्तीय क्षमता के अभाव या मीडिया के दुरूपयोग से पैसे कमाने की रूचि से आने वालों को निश्चित ही रोका जाना चाहिए। चैनल में नियुक्त कर्मियों के रोजगार गारंटी के लिए कड़े नियमों के आघार पर ही नए नियोक्ताओं को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलनी चाहिए। मीडिया जिस तरह के उद्योग में बदल रहा है उसे नियमों से बांधे बिना कर्मियों के हितों की रक्षा असंभव है। पैसे लेकर खबरें छापने या दिखाने के कलंकों के बाद अब मीडिया को और छूट नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि हर तरह की छूट दरअसल पत्रकारिता या मीडिया के लिए नहीं होती, ना ही वह उसके कर्मचारियों के लिए होती है, यह सारी छूट होती है मालिकों के लिए। सो नियम ऐसे हों जिससे मीडिया कर्मी निर्भय होकर, प्रतिबद्धता के साथ अपना काम कर सकें। केंद्र सरकार अगर चैनलों की भीड़ रोकने और उन्हें नियमों में बांधने के लिए आगे आ रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। ध्यान रहे यह मामला सेंसरशिप का नहीं हैं। पत्रकारों के कल्याण, उनके जीवन से भी जुड़ा है, सो इस मुद्दे पर एलर्जिक होना ठीक नहीं है। ( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Friday, March 12, 2010

मीडिया के विस्तार में सहायक बनी नई प्रौद्योगिकी


- संजय द्विवेदी


बात अगर नई तकनीक और प्रौद्योगिकी की करें तो उसने अखबारों की ताकत और उर्जा का विस्तार ही किया है। अखबारों का नया रूप ज्यादा स्वीकार्य, सुदर्शन और व्यापक हुआ है तो इसके पीछे इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी का विकास ही है। सूचना की दुनिया की बढ़ती गति ने अखबारों के कार्यालयों का स्वरूप बदल गया। खबरें ज्यादा तेजी से, ज्यादा सज-धज के सामने आने लगीं। कम्प्यूटर पर पेजमेकिंग के नित नए साफ्टवेयर्स ने अखबारों को बेहद सजीला बना दिया है। आंचलिक अखबारों की बढ़ी ताकत और उनके नित नए संस्करणों का विकास दरअसल सूचना प्रौद्योगिकी और प्रिटिंग टेक्नालाजी में आए बदलावों के चलते ही संभव हुआ है। इसी आईटी क्रांति ने भाषाई पत्रकारिता को नवजीवन और नया जोश दिया है। यह दरअसल भारत जैसे देश के लिए एक नई परिघटना है। तेजी से बढ़ती साक्षरता, लोगों की बढ़ती क्रयशक्ति और स्टेटस सिंबल के रूप में बदलते अखबार एक ऐसी घटना है जिसे समझना जरूरी है। शायद यही कारण है कि भारत प्रिंट मीडिया के सबसे बड़े विश्वबाजार के रूप में उभर रहा है।
ये विकास का पहला चरण है, विकास का यह दौर अभी शुरू हुआ है जाहिर तौर पर वह लंबा खिचेंगा। विद्वानों की मानें तो भारतीय प्रिंट मीडिया को अभी दस या पंद्रह सालों तक कोई गंभीर चुनौती बेब माध्यम प्रस्तुत कर पाएंगें ऐसा नहीं लगता। लेकिन क्या दूसरे चरण में भी अखबारों की यह विकासयात्रा जारी रह पाएगी यह सवाल सबके सामने है। दस या पंद्रह साल बाद ही सही अखबारों के सामने चुनौती के रूप में वेब माध्यम का विकास तो हो ही रहा है। वह कुछ प्रतिशत में ही सही, अखबार को सूचना का प्राथमिक श्रोत तो नहीं ही रहने देगा। आज यह आंकड़ा बहुत कम जरूर है किंतु यह तेजी से बढ़नेवाला है इसे मान लेना चाहिए। हम इसे आज की युवा पीढ़ी जो शहरों में रह रही है कि बदलती आदतों से समझ सकते हैं कि वह किस माध्यम के ज्यादा करीब है। इंटरनेट के अविष्कार ने इसे एक ऐसी शक्ति दी जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। वेबसाइट्स के निर्माण से ई-रीडिंग का प्रचलन भी बढ़ा है । हमारे पुस्तकालय खाली पड़े होंगे किंतु साइबर कैफै युवाओं से भरे-पड़े हैं। एक क्लिक से उन्हें दुनिया जहान की तमाम जानकारियां और साहित्य का खजाना मिल जाता है। यह सही है उनमें चैटिंग और पोर्न साइट्स देखनेवालों की भी एक बड़ी संख्या है किंतु यह मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि नई पीढ़ी आज भी ज्यादातर सूचना या पाठ्य सामग्री की तलाश में इन साइट्स पर विचरण करती है। तकनीक कभी भी किसी विधा की दुश्मन नहीं होती, वह उसके प्रयोगकर्ता पर निर्भर है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करता है। नई तकनीक ने सूचनाओं का कवरेज एरिया तो बढ़ा ही दिया ही साथ ही ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों के प्रति युवाओं की पहुंच का विस्तार भी किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। यह सारा कुछ हमारे पढने के समय की ही चोरी है। परंपरागत तरीके के अध्ययन से यह तरीका अलग है। अखबार तो नेट और मोबाइल पर पढ़े जा सकते हैं, आपके टीवी सेट पर भी देखे जा सकते हैं।
अखबारों की पठनीयता पर कोई गंभीर अध्ययन कराया जाए तो इसके सही निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। अखबार शहरी क्षेत्रों में पढ़े नहीं, पलटे जा रहे हैं। फिर इनके प्रसार बढ़ने का कारण क्या है। सही मानें तो अखबार एक स्टेटस सिंबल में बदल गए हैं। पढ़ने के मातृभाषा का अखबार और डायनिंग हाल में रखने को अंग्रेजी का अखबार। चार लोगों के रहने वाले घर में भी दो या चार अखबार आसानी से आते हैं। बढ़ती क्रय शक्ति भी इसका उत्प्रेरक तत्व बनी है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती साक्षरता प्रेरक तत्व बनी है। सूचना पाने की उत्कंठा आज समाज के हर वर्ग में हैं। कंप्यूटर साक्षरता की धीमी गति, बिजली की कम उपल्ब्धता, मंहगे कंप्यूटर धीमी इंटरनेट कनेक्टिविटी ने अखबारों के लिए जीवनदान का काम किया है। आपको टीवी देखते, इंटरनेट पर विचरण करते युवाओं की टोली मिल जाएगी पर अखबार को धर्मग्रंथ की तरह बांचते अब प्रौढ़ या वृद्ध ही दिखते हैं।
इस तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के नाते उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस मामले में इंटरनेट अभी ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्च भी कम है और ब्लाग तो निःशुल्क ही हैं। सो एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति को सुलभ मानता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहां सीधा औऱ सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक है इसके चलते वेबमाध्यम अभी उतने प्रभावी नहीं दिखते, पर यह तकनीक सही मायने निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तेमाल ने एक अनजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपना ब्लाग मुफ्त में ही बनाकर अपनी रचनाशीलता से दूर बैठे अपने दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। भारत जैसे देश में जहां साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के इंतजाम से जीवित रह सकता है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि इस पत्रिका का टिका रहना, विपणन रणनीति पर नहीं, उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। वेबसाइट्स पर चलने वाली पत्रिकाएं और सूचनाप्रधान अखबार अपनी गुणवत्ता से जीवित रहते हैं जबकि प्रिंट पर छपने वाली पत्रिकाएं और अखबार अपनी विपणन रणनीति और अर्थ प्रबंधन की कुशलता से ही दीर्धजीवी हो पाते हैं। सो साहित्य के अनुरागी जनों के लिए ब्लाग जहां एक मुफ्त की जगह उपलब्ध कराता है वहीं इस माध्यम पर नियमित पत्रिका या विचार के फोरम मुफ्त चलाए जा सकते हैं। इसमें गति भी है और गुणवत्ता भी। इस तरह बाजार की संस्कृति का विस्तारक होने की आरोपी होने के बावजूद आप इस माध्यम पर बाजार के खिलाफ, उसकी अपसंस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। इस मायने में यह बेहद लोकतांत्रिक माध्यम भी है। इसने पत्राचार की संस्कृति को ई-मेल के जरिए लगभग खत्म तो कर दिया है पर गति बढ़ा दी है, इसे सस्ता भी कर दिया है।
सही मायने में अभी हिंदी समाज को ई-संस्कृति विकसित होने का इंतजार करना पड़ेगा। इसके चलते भले ही प्रिंट माध्यम अपनी उपयोगिता बनाए रख सकते हैं। बावजूद हिंदी का यह बन रहा विश्व समाज हमें नए मीडिया के द्वारा खोले गए अवसरों के उपयोग करने वाली पीढ़ी तैयार कर रहा है। हिंदी का श्रेष्ठ साहित्य न्यू मीडिया में अपनी जगह बना सके इसके प्रयास हो रहे हैं। इंटरनेट ने प्रायः उन विधाओं और विषयों को फोकस किया है जो प्रायः मुख्यधारा के मीडिया से गायब हो रहे हैं। प्रिंट में अनुपस्थित बहुत सी विधाओं और विषयों पर इंटरनेट पर गंभीर विमर्श देखे जा रहे हैं। सो यह माध्यम देर-सबेर एक चुनौती के रूप में सामने तो खड़ा है ही। भारत के प्रायः सभी अखबार आज अपनी वेबसाइट बना चुके हैं इसका मतलब यह है कि उन्होंने इस माध्यम की स्वीकार्यता को समझ लिया है। इसके साथ ही कई अखबार मोबाइल पर भी खबरें दे रहे हैं। सो प्रिंट माध्यम के धराने एक साथ रेडियो, टीवी, फिल्म, मोबाइल न्यूज,वेबमाध्यम सभी में प्रवेश कर रहे हैं। इससे एक माध्यम दूसरे माध्यम को चुनौती भी देता हुआ दिखता है तो सहयोगी की भूमिका में भी है। इसे प्रिंट माध्यमों से जुड़े घरानों का विस्तारवाद तो कहा ही जा सकता है पर इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि इन घरानों ने प्रिंट माध्यम या अखबारों की सीमाएं समझ ली हैं। आने वाला समय सूचना के विविध माध्यमों में आपसी संघर्ष के गवाह बनेगा जिसे देखना निश्चय ही रोचक होगा।